Wednesday, August 24, 2011
nyayik sakriyata k piche ka sach
वर्तमान में भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में न्यायिक सक्रियता का सवाल बहस का मुद्दा है। कहीं न्यायिक सक्रियता को लेकर प्रशंसा हो रही है तो कुछ लोग इसे न्यायपालिका का सीमा उल्लंघन बता रहे हैं। सरकार के कामकाज में दखलंदाजी के चलते न्यायिक सक्रियता को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। पूरी दुनिया में चाहे राष्ट्रपति के चुनाव का मामला हो, सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्षता के सवाल की बात हो या राजनीतिक उथल-पुथल का बात हो, न्यायालय अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। हमारे यहां न्यायिक सक्रियता पर न्यायपालिका को भारी आलोचना सुननी पड़ रही है। इस बीच बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्याय के हित में कोई भी आदेश सुनाने के लिए उसके पास असीमित असाधारण संवैधानिक शक्तियां हैं। भले ही ऐसा करने के लिए वैधानिक प्रावधानों से बाहर निकलना पड़े वह निकल सकता है। यह व्यवस्था सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस एचएल गोखले की पीठ ने एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ आइपीसी की धारा 498-ए के तहत दी। पिछले दिनों काले धन के मामले पर भी खींचतान देखने को मिली। सरकार का मानना है कि काले धन के स्त्रोतों का पता लगाकर उसकी वसूली का काम कार्यपालिका का है न कि न्याय पालिका का। इस मामले में सरकार का मत है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशेष समिति का गठन कार्यपालिका के संवैधानिक दायरे का उल्लंघन या खुलेआम हस्तक्षेप है जिस पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। इस संबंध में सरकार का पक्ष संवैधानिक दृष्टि से सही हो सकता है, लेकिन आखिर वे कौन से कारण रहे जिनके चलते जन सवालों की उपेक्षा किए जाने के फलस्वरूप न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने के लिए विवश होना पड़ा। आखिर यह स्थिति क्यों पैदा हुई इस पर विचार किया जाना चाहिए। सवाल यह है कि न्यायालय की ऐसी कौन सी मजबूरी थी जो विधायिका और कार्यपालिका के कामों में उसे दखल देना पड़ा। जाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति तभी आती है जबकि विधायिका और कार्यपालिका अपने दायित्व का निर्वहन सही ढंग से करने में अक्षम हों या कमजोर हो। सरकार भले ही यह तर्क दे कि न्यायपालिका बहुत से मामलों में ऐसे निर्णय दे चुकी है कि नीति निर्माण और उसके सही तरीके से क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सरकार की है। न्यायालय का दायित्व तो सिर्फ संविधान और उसके अंतर्गत निर्मित कानूनों की व्यवस्था करना है, लेकिन इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि संविधान की रक्षा का सबसे बड़ा दायित्व न्यायपालिका का होता है न कि सरकार का। यही वह अहम कारण है, जिसके चलते अक्सर न्यायपालिका को ऐसे निर्णय लेने पर विवश होना पड़ता है, जो संविधान की दृष्टि से जनहित से जुड़े होते हैं न कि उसमें सरकार का हित निहित हो। उसके लिए संविधान सर्वोपरि है, न कि सरकार। वह बात दीगर है कि भारतीय न्यायिक प्रणाली विश्व में सर्वश्रेष्ठ नहीं है। इस तथ्य को न्यायमूर्ति एसएन ढींगरा भी कह चुके हैं। यह भी सच है कि 75 फीसदी लोगों का न्याय प्रणाली से विश्वास उठ गया है। सर्वेक्षण बताते हैं कि 75 फीसदी लोगों का न्याय प्रणाली से विश्वास डगमगाने लगा है। वह पारदर्शी न्याय प्रणाली के लिए बेचैन हैं। जनता मुकदमों के निपटारे की समय-सीमा का निर्धारण चाहती है। उसकी राय है कि कानून से ऊपर कोई नहीं हो सकता। देश के अन्न भडारों में लाखों टन खाद्यान्न के सड़ने का मामला हो, नोट के बदले वोट का मामला हो, सीवीसी की नियुक्ति को रद करने का मामला हो, काले धन का मामला हो, टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला हो, आदर्श सोसाइटी घोटाला हो या राष्ट्रमंडल खेल घोटाला ये सभी न्यायिक सक्रियता के कारण ही उजागर हुए हैं। न्यायिक सक्रियता का ही परिणाम है कि बड़े-बड़े प्रभावशाली नेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा। न्यायपालिका की इस पहल का देश की जनता ने दिल खोलकर न केवल स्वागत किया, बल्कि सराहना और प्रशंसा भी की है। उसकी नजर में जो काम सरकार को करना चाहिए था, वह न्यायपालिका ने किया। जनता यह भलीभांति जान चुकी है कि यदि न्यायपालिका इन सवालों पर संज्ञान नहीं लेती तो यह घपले-घोटाले कभी उजागर नहीं होते। सरकार तो अपनी कुर्सी बचाने की खातिर लापरवाह बनी रहकर इन पर लीपापोती की भरसक कोशिश करती नजर आयी। कार्यपालिका पर पर्दा डालने की कोशिश का ही नतीजा है कि आज न्यायपालिका को कार्यपालिका के दायित्व को भी निभाना पड़ रहा है। कई जांच न्यायपालिका की निगरानी में चलना इसका सुबूत है। इसके लिए तो सरकार को न्यायपालिका की प्रशंसा करनी चाहिए। सच तो यह है कि यह समय कार्यपालिका और विधायिका के लिए आत्ममंथन का है, राजनीतिक मजबूरियों पर विचार कर उनसे पार निकलने का है ताकि आने वाले समय में संविधान प्रदत्त अपने अधिकारों व कर्तव्यों का सीमाओं में रहकर पालन किया जा सके। ऐसी स्थिति न आने दें कि न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य होना पड़े। यह तभी होता है जबकि विधायिका और कार्यपालिका जन सवालों को महत्व नहीं देती हैं। ऐसी स्थिति में जब न्यायपालिका हस्तक्षेप करती है तो वह सरकारों के कोप का, आलोचना का पात्र बनती है। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी बीते साल स्पष्ट कर चुके हैं कि देश में विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत है। हमारी व्यवस्था शक्तियों के पृथक्कीकरण के सिद्धांत पर काम करती है। इस सिद्धांत में बारीक अंतर है और इस अंतर को समझने की जरूरत है। साथ ही सार्वजनिक घोषणाओं के दौरान सतर्कता बरतने की जरूरत है ताकि हर समय उचित संतुलन बनाए रखना सुनिश्चित किया जा सके। सभी व्यवस्थाएं दबाव और तनाव से गुजरती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक प्रणाली इसका जवाब चर्चा और विचार-विमर्श आयोजित करके देती है। आज के समय में विभिन्न कारणों से यह और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है, जब हम इसमें से कुछ चीजों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। राज्यसभा के उपसभापति के. रहमान खान का भी मानना है कि जहां संसद कानून बनाने का सर्वोच्च निकाय है वहीं न्यायपालिका संविधान और विधायिका द्वारा पारित किए गए कानून की व्याख्या करने की अंतिम शक्ति है। हालांकि विधायिका और न्यायपालिका दोनों ही को अपने कार्य के लिए पूर्ण स्वायत्तता और स्वतंत्रता है फिर भी कुछ ऐसे अवसर आते हैं जबकि दोनों के बीच मतभेद पैदा हो जाते हैं। यह भी सही है कि इससे सत्ताधारी दल के स्वार्थ सिद्ध होते हैं। ऐसे कानूनों को रद करने के मामले अक्सर सुप्रीम कोर्ट और राज्य हाईकोर्ट सामने आए हैं और उन्हें न्यायालय द्वारा समय-समय पर रद भी किया गया है। यह न्यायपालिका के संविधान की रक्षा करने के अधिकार का जीता-जागता सबूत है। जहां तक कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका के हस्तक्षेप का सवाल है, यह सही नहीं है।
रियल एस्टेट-टेलीकॉम में घटा एफडीआइ
नई दिल्ली, एजेंसी : तेजी से आर्थिक विकास की संभावनाओं वाले रियल एस्टेट, निर्माण और दूरसंचार क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) पिछले वित्त वर्ष में सबसे ज्यादा घटा है। जबकि सेवा क्षेत्र, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, ऑटोमोबाइल, ऊर्जा, धात्विक उद्योग, रसायन, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी एफडीआइ में मामूली वृद्धि हुई है। वहीं इलेक्टि्रकल इक्विटपमेंट, बिजली और तेल रिफाइनरी सहित ईधन, दवा, खाद्य प्रसंस्करण और सीमेंट क्षेत्र में पिछले चार साल में कोई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नहीं हुआ है। उद्योग संगठन एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने कहा कि विकासशील देशों के समूह ब्रिक्स देशों में सबसे कम एफडीआइ भारत में हुआ है। देश की आर्थिक वृद्धि की रणनीति मुख्यतौर पर घरेलू उद्यमों और घरेलू मांग पर केंद्रित है जिसमें एफडीआइ और निर्यात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा। वित्त वर्ष 2010-11 में देश में कुल 19.4 अरब डॉलर का एफडीआइ आया जबकि वर्ष 2009-10 में 25.9 अरब डॉलर और वर्ष 2008-09 में 27.3 अरब डॉलर का एफडीआइ देश में आया था। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका (ब्रिक्स) देशों में 2010-11 में सबसे ज्यादा एफडीआइ चीन में 105.7 अरब डॉलर का रहा। इसमें इक्विटी पूंजी, अर्जित आय का पुन:निवेश और अन्य पूंजी शामिल है। ब्राजील में इस दौरान 71.8 अरब डॉलर और रूसी महासंघ में 41.2 अरब डॉलर का एफडीआइ आया। इक्विटी, पुनर्निवेश तथा कंपनियों के बीच आंतरिक कर्ज को मिलाकर भारत में 41.8 अरब डॉलर का एफडीआइ इस दौरान आया। रावत ने कहा कि देश में वित्तीय क्षेत्र पूरी तरह विकसित है। यहां औद्योगिक आधार भी काफी व्यापक है और शिक्षित कर्मियों की बड़ी संख्या मौजूद है। ऐसे में भारत एफडीआइ का लाभ उठाने के लिहाज से बेहतर स्थिति में है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए नीति निर्माताओं को विदेशी निवेश के लिए एक आकर्षक स्थल के तौर पर पेश करने के प्रयास करने चाहिए। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि में 2006-07 में एफडीआइ का हिस्सा 7.5 प्रतिशत और 2007-08 में 8.8 प्रतिशत रहा। वर्ष 2009-10 में यह 13 प्रतिशत तक पहुंच गया लेकिन वर्ष 2010-11 में यह घटकर 12.2 प्रतिशत रह गया। इसके विपरीत दक्षिण अफ्रीका में एफडीआइ जीडीपी के मुकाबले 36.6 प्रतिशत, रूस में 28.7 प्रतिशत और ब्राजील में 22.9 प्रतिशत रहा। हालांकि चीन में एफडीआइ जीडीपी का 9.9 प्रतिशत रहा।
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