Thursday, August 11, 2011

क्‍या आप जानते हैं

तथ्‍य सारणी

· वर्ष 2011 के अंत में ि‍वश्‍व की जनसंख्‍या 7 अरब तक पहुंच जाएगी । (यह संख्‍या 50 वर्ष पहले रहने वाले लोगों की संख्‍या के दोगुने से भी अधि‍क है) इनमें से लगभग आधी आबादी महि‍लाओं और लड़कि‍यों की है ।

· एक अरब 1.2 अरब लोग गरीबी में जीवन व्‍यतीत कर रहे हैं । इनमें से 70 प्रति‍शत आबादी महि‍लाओं और बच्‍चों की है ।

· एक अरब से भी अधि‍क वयस्‍क नि‍रक्षर हैं, जि‍नमें 66 प्रति‍शत आबादी महि‍लाओं की है ।

· 2 करोड़ 70 लाख शरणार्थी हैं, जि‍नमें 80 प्रति‍शत संख्‍या महि‍लाओं और बच्‍चों की है ।

प्रत्‍येक दि‍न ........

· हममें से एक अरब लोग भूखे सोते हैं ।

· हममें से 2 अरब लोग प्रति‍दि‍न एक डॉलर से भी कम राशि‍पर जीवन व्‍यतीत कर रहे हैं ।

· हममें से एक अरब लोग को स्‍वच्‍छ जल उपलब्‍ध नहीं है ।

· गर्भावस्‍था या प्रसव के दौरान एक हजार से भी अधि‍क महि‍लाओं की मृत्‍यु हो जाती है ।

एक अकेला व्‍यक्‍ति‍नि‍म्‍नलि‍खि‍त कार्य कर सकता है ....

· एक बच्‍चे को पढ़ना सि‍खा सकता है ।

· एक पेड़ लगा सकता है ।

· एक वरि‍ष्‍ठ नागरि‍क से मि‍ल सकता है ।

· एक समाधान खोज सकता है ।

· दूसरों की मदद के लि‍ए खड़ा हो सकता है ।

· कि‍सी के चेहरे पर मुस्‍कराहट ला सकता है ।

स्रोत : संयुक्‍त राष्‍ट्र

आर्थिक विकास का मूलाधार : बुनियादी सुविधाएं

यह सर्वविदित है कि भारत की आर्थिक विकास दर में तेजी आयी है और अब हमारी औसत वृद्धि दर 8 प्रति‍शत से अधिक होने जा रही है। एक आकर्षक कहानी उद्घटित हाने जा रही है और समूचा विश्व भारत के प्रमुख आर्थिक ताकत के रूप में उभरने को चकित आंखो से देख रहा है। लेकिन इस विकास की सीमायें भी हैं। समाज के अनेक सीमांत वर्गों और व्यापक कृषक समुदाय को इस विकास प्रक्रिया का लाभ नहीं पहुँचा है। ऐसे में हमें एक तीव्र और अधिक समाविष्ट करने वाली विकास प्रक्रिया की आवश्यकता है ये दोनों हमारे लिए चुनौती है, किन्तु दोनों को निरंतर प्रयासों के जरिये हासिल किया जा सकता है।

यह ठीक है कि विकास दर 8 प्रति‍शत तक पहुँच चुकी है लेकिन निश्चय ही हम इससे बेहतर कर सकते हैं। गरीबी भारत की एक प्रमुख समस्‍या है, यदि इसे असरदार तरीके से दूर करना है और साथ ही युवा आबादी को लाभकारी रोजगार प्रदान करना है तो विकास दर 9-10 प्रति‍शत तक अवश्य बढ़ानी होगी। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना का व्यापक लक्ष्य इसी उद्देश्य को हासिल करना होना चाहिए। उपरोक्त विकास दर कृषि तथा बुनियादी क्षेत्र के विकास की दिशा में जोरदार प्रयास करके हासिल की जा सकती है, इस लेख में यही उद्देश्य समाहित है।

बुनियादी ढ़ांचा विकास के लिए विशाल संसाधनों की आवश्यकता है। योजना आयोग का अनुमान है कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान बुनियादी ढांचा क्षेत्र-जिसमें मोटे तौर पर सड़क, रेल, विमान एवं जल परिवहन, विद्युत ऊर्जा, दूरसंचार, जलापूर्ति और सिंचाई शामिल हैं-पर 14,50,000 करोड़ रुपये या 320 अरब अमरीकी डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी। यह समूचा निवेश केवल और केवल सार्वजनिक संसाधनों से संभव नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि अब सरकार को सामाजिक क्षेत्र में निवेश बढ़ाना है। यानि शिक्षा, चिकित्सा , स्वास्थ्य, आवास आदि। अब केवल सरकार ही जनसामान्य के लिए सड़क, रेल, विमान और जहाज की व्यवस्था नहीं करेगी। अब सार्वजनिक-निजी भागीदारी, ढांचागत सुधार में मददगार हो सकती है। दूर संचार क्षेत्र को मुक्त बनाना इसका खास उदाहरण है। दूर संचार क्षेत्र में निजी-निवेश की अनुमति दिये जाने से व्यापक निवेश हुआ और आपूर्ति के विस्तार के साथ-साथ गुणवत्ता में सुधार आया। इसी प्रकार उड्डयन के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की बदौलत नई क्षमता पैदा हुई है और यात्रियों को अधिक विकल्प उपलब्ध हुए हैं। विमान यातायात में 20 प्रति‍शत से अधिक वृद्धि हुई है जबकि किरायों में पर्याप्त कमी आई है। यहाँ तक कि सड़क क्षेत्र में भी सार्वजनिक निजी-भागीदारी की प्रभावकारिता प्रदर्शित हुई है। यह प्रयोग जयपुर-किशनगढ़, राजमार्ग पर सफलतापूर्वक किया गया।

परन्तु यह भी ध्यान देने की बात है कि सार्वजनिक- निजी भागीदारी के जरिये या किसी अन्य मार्ग से निजी क्षेत्र से पूंजी आकर्षित करना न तो आसान है और न ही स्वतः संभव है। इसके लिए पूर्वापेक्षित है कि नीतिगत फ्रेमवर्क तैयार करना है, जो निवेशकों के लिए उचित लाभ सुनिश्चित कर सके। ऐसे में उपभोक्ताओं के हितों विशेषकर निर्धनों के हितों की रक्षा करने की भी दक्षनीति होनी चाहिए। तभी ही सार्वजनिक-निजी भागीदारी सफल हो सकती है।

हम जानतें हैं कि भारत एक संघीय राष्ट्र है और संघीय शब्द में विश्वस्तरीय ढ़ांचे का निर्माण राज्य सरकारों के सहयोग एवं समर्थन पर पर्याप्त हद तक निर्भर है। केन्द्र सरकार चाहें कितनी भी अच्छी नीति या कार्यक्रम क्यों न बनाये, उसे लागू तो राज्यों के कोने-कोने में ही करना है तभी ही व्यावहारिक कहलायेगी, और यह तभी ही होगा जबकि राज्य अपना सहयोगपूर्ण रवैया रखें। इसमें कई पहलू हैं जैसे- कानून व्यवस्था, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुर्नस्थापना, सेवाओं का स्थानांतरण और वन एवं पर्यावरण संबंधी मंजूरियां। राज्यों को चाहिए कि वे पारदर्शिता एवं प्रभावकारी ढ़ंग से सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजनाओं को लागू करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु केन्द्रीय मंत्रालयों द्वारा अपनायी जा रही पद्धतियों की जानकारी प्राप्त करें। राज्य गुणवत्ता युक्त बुनियादी ढ़ाँचा बनाने के प्रयासों में तेजी लायें ताकि उनके राज्यों में निवेश और विकास की गति तेज हो सके। इससे राज्यों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। वे देश के विकास की मुख्य धारा में बराबरी से शामिल हो सकेगें। वित्त मंत्रालय और योजना आयोग भी किसी भेदभाव के बिना राज्यों की इस बाबत सक्रिय रूप से सहायता करें।

हालांकि सरकार ने बुनियादी ढ़ांचे के सभी क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासि‍ल की हैं। सड़क क्षेत्र में स्वर्णि‍म चतुर्भुज को चार लेन वाला बनाने का काम न केवल पूरा होने के करीब है, बल्कि ’’बनाओ-चलाओ-सौंपो’’ आधार पर समूचे स्वर्णि‍म चतुर्भुज मार्गों को 6 लेन का बनाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी गई है। इस अकेली परियोजना पर 40,000 करोड़ रुपये की लागत आयेगी। इस राशि का 15 प्रति‍शत हिस्सा बजटीय सहायता से प्राप्त होगा। 1000 किमी. लम्बे एक्सप्रेस मार्ग के निर्माण का कार्यक्रम भी शुरू किया गया है। ’’रेलवे’’ 3,00,000 करोड रुपये से अधिक के निवेश का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम तैयार कर रहा है। जिसमें से करीब 40 प्रति‍शत सार्वजनिक निजी भागीदारी के माध्यम से निजी क्षेत्र से हासिल किये जाने की संभावना है। प्राईवेट कंटेनर रेलगाडि़याँ, माल ढु़लाई, स्टेशनों का विकास और आधुनिकीकरण, लॉजिस्टिक पार्कों और गोदामों की स्थापनायें सभी ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें महत्वपूर्ण निजी भागीदारी की आवश्यकता है।

नागर विमानन क्षेत्रों में हवाई अड्डा बुनियादी सुविधाओं के लिए वित्त व्यवस्था की योजना विकसित की गई है। इसमें 2012 तक इस क्षेत्र में 40,000 करोड़ रुपये के निवेश का प्रावधान है। निजी विकास के जरिए हरित क्षेत्र हवाई अड्डों को भी पहचान की गई है, जिनका विकास नि‍जी कंपनियों की भागीदारी से हो सकेगा।

इसी तरह प्रमुख बन्दरगाहों पर निजी आपरेटरों द्वारा गोदियों के परिचालन के सफल अनुभव से प्रेरित होकर सरकार 2012 तक 75 नई गोदियों के विकास की योजना बना रही है। जिसमें 53 का विकास निजी-सार्वजनिक भागीदारी के जरिए किया जायेगा।

उपरोक्त विवरण का सार एक तथ्य की ओर आकर रूक जाता है, वह है विद्युत की निरंतर की व्यवस्था। इस बुनियादी सेवा की व्यवस्था किये बिना भारत आर्थिक शक्ति का केन्द्र बनने की कल्पना भी नही कर सकता, देश के अधिकांश राज्यों में बिजली की कमी की समस्या बनी हुई है। राज्यों के विद्युत बोर्ड भारी घाटे में चल रहे रहें हैं। कोई भी सभ्य समाज और वाणिज्यिक दृष्टि से काम करने वाली कंपनी इतनी बडी क्षति को बर्दाश्त नहीं कर सकती। ऐसा अनुमान है कि कुल बिजली उत्पादन का करीब 40 प्रति‍शत भाग पारेषण और वितरण के दौरान नष्ट हो जाता है। ऐसे में राज्यों का यह दायित्व बनता है कि यदि विकास का लाभ लेना चाहते हैं तो बिजली की इस अव्यवस्था को उन्हें सुप्रबंधित करना होगा। क्योंकि केन्द्र केवल संसाधनों को उपलब्ध करवा सकता है, प्रबंधन तो राज्यों को ही देखना होगा। बिजली क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा के लिए अवश्य खेलना होगा, क्योंकि ऐसा करने से न केवल उपभोक्ताओं के सामने विकल्प उपलब्ध होंगे बल्कि सक्षमता बढ़ेगी और लागत में भी कमी आयेगी। इसके अलावा बडे़ उपभोक्ताओं को सीधे बिजली बेचने का अवसर मिलने से बिजली उत्पादकों को ऐसे बाजार का निर्माण करने में मदद मिलेगी, जिससे जेनरेशन क्षमता में निवेश में तेजी आयेगी।

उपरोक्त विवरण के आधार पर यह संदेह नहीं है कि आर्थिक विकास को यथार्थता का आवरण तभी पहनाया जा सकता जबकि बुनियादी ढ़ांचागत सुविधाओं का विकास सुदृढ़ योजनागत रूप से हो। इस विकास का उत्तरदायित्व केवल केन्द्र सरकार का ही नहीं बल्कि राज्यों पर भी उसी मात्रा में उत्तरदायित्व जाता है। उन्हें अपनी मानसिकता को बदलना होगा और केन्द्र द्वारा बनायी विकास योजनाओं में सक्रिय रूप से सहभागिता करनी होगी। तभी देश का हरेक कोना आर्थिक रूप से मजबूत होगा और देश स्वाभाविक रूप से आर्थिक महाशक्ति बनेगा।(पसूका)

बाबू जगजीवन राम छात्रावास योजना

बाबू जगजीवन राम (5 अप्रैल, 1908-6 जुलाई, 1986) जिन्‍हें प्‍यार से लोग बाबूजी बुलाया करते थे, एक स्‍वाधीनता सेनानी और सामाजिक न्‍याय के मसीहा थे। उन्‍होंने शोषितों और दलितों को समान अवसर दिलाने के लिए समर्पित एक संगठन ‘अखिल भारतीय शोषित वर्ग लीग’ स्‍थापित करने में अहम भूमिका निभाई। 1946 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अस्‍थायी सरकार में वह सबसे युवा मंत्री थे। भारत के पहले केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल में वह श्रम मंत्री और संविधान सभा के सदस्‍य बने, जहां उन्‍होंने सुनिश्चित किया कि सामाजिक न्‍याय की व्‍यवस्‍था संविधान में की जाए। एक राष्‍ट्रीय नेता, सांसद, केन्‍द्रीय मंत्री और शोषित वर्ग के मसीहा के रूप में, उन्‍होंने भारतीय राजनीति में लंबी पारी खेली और उप प्रधानमंत्री (1977) के पद तक पहुंचे। राजनैतिक नेतृत्‍व की क्षमता रखने वाले बाबू जगजीवन राम ने हमारे देश के राजनैतिक और संवैधानिक विकास तथा सामाजिक बदलाव में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई।

बाबू जगजीवन राम की विचारधारा, उनके जीवन दर्शन और मिशन तथा दलितों के लिए उनकी सेवाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनकी समृति में नयी दिल्‍ली में ‘’बाबू जगजीवन राम राष्‍ट्रीय प्रति‍ष्‍ठान’’ की स्‍थापना की गई। सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत यह फाउंडेशन एक स्‍वायत्‍त्‍शासी संगठन के रूप में कार्य कर रहा है।

संविधान का अनुच्‍छेद 16 केन्‍द्र सरकार को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह समाज के शोषित वर्ग के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए विशेष प्रावधान करे ताकि उन्‍हें भी समाज के अन्‍य वर्गों के बराबर सुविधाएं मिल सकें। शिक्षा किसी भी तरह के सामाजिक-आर्थिक विकास का आधार है। अनुसूचित जातियों के लिए शिक्षा का महत्‍व इसलिए और बढ़ जाता है कि इससे उनका सामाजिक दर्जा बढ़ता है और उनमें रोजगार और अन्‍य आर्थिक गतिविधियों में उभरते अवसरों का लाभ उठाने की सूझबूझ पैदा होती है।

जाति, धर्म, क्षेत्र और इस तरह की अन्‍य बाधाओं से हटकर देखा जाए तो देश में निरक्षरता एक आम समस्‍या है। अनुसूचित जाति के लोगों के जीवन और स्थिति पर इसका प्रभाव अलग से दिखाई देता है। अनुसूचित जाति के समूहों में महिलाओं को सामाजिक बंधनों, फिर महिला होने और इसके बाद कम पढ़े-लिखे होने जैसे संकटों को झेलना पड़ता है।

लड़कियों के लिए छात्रावास के निर्माण की योजना का उद्देश्‍य घरेलू कामकाज के बंधन से मुक्‍त माहौल में अध्‍ययन के लिए अनुकूल माहौल बनाना है ताकि लक्षित समूह के छात्र अपनी पढ़ाई बीच में छोड़े बिना कैरियर बना सकें। इस तरह के छात्रावास ग्रामीण और सुदूरवर्ती इलाकों के अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए काफी लाभदायक रहे हैं।

लड़कियों के लिए छात्रावास के निर्माण की योजना तीसरी पंचवर्षीय योजना से शुरू हुई जबकि लड़कों के लिए यह योजना वर्ष 1989-90 में शुरू की गई। अनुसूचित जाति के लड़कों और लड़कियों के लिए छात्रावास बनाने की पूर्व में केन्‍द्र द्वारा प्रायोजित योजना में 1 जनवरी, 2008 में संशोधन किया गया और इसे ‘’ बाबू जगजीवन राम छात्रावास योजना’’ नाम दिया गया। संशोधित योजना में जो मुख्‍य बदलाव किये गए उनमें लड़कियों के लिए छात्रावास बनाने के लिए (क) राज्‍यों/केन्‍द्र शासित और केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों को 100 फीसदी और डीम्‍ड विश्‍वविद्यालयों और निजी संस्‍थानों को 90 फीसदी सहायता देना शामिल है और (ख) छात्रावासों के निर्माण वर्तमान अवधि की 5 वर्ष से घटाकर 2 वर्ष कर दी गई है।

यह योजना माध्‍यमिक, उच्‍च्‍तर माध्‍यमिक स्‍कूलों, कॉलेजों और विश्‍वविद्यालयों में पढ़ने वाले अनुसूचित जाति के लड़के-लड़कियों के लिए रहने की व्‍यवस्‍था सुनिश्चित करने के उद्देश्‍य से शुरू की गई।

राज्‍य सरकारें/केन्‍द्र शासित प्रशासन और केन्‍द्र तथा राज्‍य के विश्‍वविद्यालय/संस्‍थान नये छात्रावास की इमारत के निर्माण, उनके नवीनीकरण, मरम्‍मत और विस्‍तार के लिए केन्‍द्रीय सहायता के पात्र हैं। जबकि गैर सरकारी संगठन और निजी क्षेत्र में डीम्‍ड विश्‍वविद्यालय अपने वर्तमान छात्रावासों के विस्‍तार के लिए ही यह सहायता ले सकते हैं।

लड़कियों के छात्रावासों के लिए सहायता का ढांचा इस प्रकार है:

* राज्‍यों/केन्‍द्र शासित प्रदेशों/ विश्‍वविद्यालयों को नये छात्रावासों के निर्माण और मौजूदा छात्रावासों के विस्‍तार के लिए शत-प्रतिशत सहायता।

* लड़कियों के छात्रावासों के विस्‍तार के लिए गैर सरकारी संगठन और निजी क्षेत्र के डीम्‍ड विश्‍वविद्यालयों को 90 फीसदी केन्‍द्रीय सहायता

* लड़कों के छात्रावासों के लिए केन्‍द्रीय सहायता

* राज्‍यों को 50:50 अनुपात के आधार पर

* केन्‍द्र शासित प्रशासनों को 100 प्रतिशत

* केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों को 90:10 अनुपात के आधार पर

* राज्‍यों के विश्‍वविद्यालयों/संस्‍थानों को 45:10 अनुपात के आधार पर

* गैर सरकारी संगठन और निजी क्षेत्र में डीम्‍ड विश्‍वविद्यालयों को (केवल विस्‍तार के लिए) 45:45:10 अनुपात के आधार पर।

योजना के अंतर्गत स्‍वीकार्य केन्‍द्रीय सहायता के अलावा प्रत्‍येक छात्र के लिए चारपाई, मेज और कुर्सी का प्रावधान करने के लिए उसे एक बार 2500 रूपये की सहायता प्रदान की जाती है।

योजना की अन्‍य प्रमुख बातें इस प्रकार हैं :

छात्रावास की लागत को पूरा करने के लिए केन्‍द्रीय सहायता जारी की जाती है और इस तरह के छात्रावासों के रखरखाव का काम सम्‍बद्ध राज्‍य सरकारों/केन्‍द्र शासित प्रशासनों के पास है।

कार्यान्‍वयन एजेंसियों को सहायता अनुदान सीधे दी जाती है। गैर सरकारी संगठन/डीम्‍ड विश्‍वविद्यालयों को सहायता दो किश्‍तों में और राज्‍य सरकार/केन्‍द्र शासित प्रशासन और केन्‍द्र और राज्‍य के विश्‍वविद्यालयों/संस्‍थानों को एक किश्‍त में सहायता दी जाती है।

लड़कियों के मामले में छात्रावास उन इलाकों में होने चाहिए जहां अनुसूचित जाति की लड़कियों की साक्षरता दर कम है। लड़कियों के छात्रावास शैक्षणिक संस्‍थानों के आसपास (जहां तक संभव हो 200 मीटर के दायरे में) बनाए गए हैं।

एक छात्रावास में 100 से ज्‍यादा छात्र नहीं होने चाहिए। लेकिन जरूरत के मुताबिक इस संख्‍या में परिवर्तन के बारे में विचार किया जा सकता है।

सचिव (सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय) की अध्‍यक्षता में एक संचालन समिति ।

छात्रावासों के निर्माण की निगरानी और समीक्षा करती है। प्रभावकारी निगरानी के लिए मंत्रालय/संचालन समिति खुद एजेंसियों/प्राधिकारियों से परियोजनाओं का निरीक्षण कराती है।

बाबू ज जगजीवन राम छात्रावास योजना से निश्चित तौर पर समाज के दलित वर्ग के छात्रों के लिए बाबूजी के सपने को साकार करने में मदद मिलेगी।

***

सामाजिक न्‍याय और अधिकारिता मंत्रालय से प्राप्‍त जानकारी पर आधारित

भारत में जैविक खेती

विक खेती समग्र रूप से एक उत्‍पादन प्रबंध प्रणाली है जो जैविक विविधता , पोषक जैविक चक्र और मिट्टी से जुड़ी जैविकीय और सूक्ष्‍म जीव क्रिया को बढ़ावा देती है और उसे चुस्‍त -दुरूस्‍त रखती है। इसे आमतौर से कृषि की एक प्रणाली के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें रासायनिक खादों/कीटनाशकों का इस्‍तेमाल नहीं किया जाता और यह मुख्‍य रूप से गोबर की खाद, पत्‍तियों की खाद, खली के इस्‍तेमाल और प्राकृतिक जैविक कीट नियंत्रण और पौधों के संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित होती है।

बढ़ते क्षेत्र

भारत में जैविक खेती की तरफ ध्‍यान 2004-05 में गया, जब जैविक खेती पर राष्‍ट्रीय परियोजना (एनपीओएफ) की शुरूआत की गई। 2004-05 में जैविक खेती के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र 42,000 हेक्‍टेयर था। मार्च 2010 तक यह बढ़कर 10 लाख 80 हजार हेक्‍टेयर हो गया। इसके अतिरिक्‍त 34 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र में जंगलों से फसल एकत्र की जाती है। इस प्रकार मार्च 2010 तक जैविक प्रमाणीकरण का कुल क्षेत्र 44 लाख 80 लाख हेक्‍टेयर था जिसमें पिछले 6 वर्ष में 25 गुना वृद्धि हुई है। जोती हुई जैविक भूमि में 7.56 लाख हेक्‍टेयर प्रमाणीकृत है,जबकि 3.2 लाख हेक्‍टेयर रूपान्‍तरण की प्रक्रिया में है।

जिन राज्‍यों में अच्‍छे तरीके से जैविक खेती की जा रही है, उनमें मध्‍य प्रदेश में 4.40 हेक्‍टेयर, महाराष्‍ट्र में 1.50 लाख हेक्‍टेयर और उड़ीसा में 95,000 हेक्‍टेयर जमीन पर जैविक खेती हो रही है। फसलों में कपास एकमात्र ऐसी फसल है जिसकी 40 प्रतिशत क्षेत्र में खेती की जाती है। इसके बाद चावल, दाल, तिलहन और मसालों की खेती होती है। भारत दुनिया में कपास का सबसे बड़ा जैविक उत्‍पादक है, और दुनिया में जैविक कपास के कुल उत्‍पादन का 50 प्रतिशत भारत में होता है।

920 उत्‍पादक समूहों के अंतर्गत आने वाले करीब 6 लाख किसान 56-40 करोड़ रूपये मूल्‍य के 18 लाख टन विभिन्‍न जैविक उत्‍पाद पैदा करते हैं। 18 लाख टन जैविक उत्‍पादों में से 561 करोड़ रूपये मूल्‍य के 54000 टन जैविक उत्‍पादों का निर्यात किया गया। पिछले कई वर्षों में जैविक उत्‍पादों का निर्यात लगातार बढ़ रहा है। 2006-07 में 301 करोड़ रूपये मूल्‍य का निर्यात हुआ, जो 2009-10 में बढ़कर 525.5 करोड़ हो गया।

जैविक खेती अपनाने वाले राज्‍य

नौ राज्‍यों ने जैविक खेती नीति का मसौदा तैयार किया है। इनमें से चार राज्‍यों, उत्‍तराखंड, नगालैंड, सिक्किम और मिजोरम ने 100 फीसदी जैविक खेती करने का अपना इरादा घोषित कर दिया है। सिक्किम पहले से ही अपनी खेती योग्‍य 40 प्रतिशत इलाके में जैविक खेती कर रहा है और उसने 2015 तक समूचे राज्‍य में जैविक खेती करने का लक्ष्‍य रखा है। अन्‍य राज्यों ने भी जैविक खेती को बढ़ावा देने की योजनाएं बनाई हैं। हाल में बिहार ने वर्ष 2010-11 से 2014-15 की अवधि में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए 256 करोड़ रूपये की एक योजना को मंजूरी दी है। यह योजना शत-प्रतिशत राज्‍य की योजना है और इसका पूरा खर्च राज्‍य सरकार उठाएगी। केन्‍द्र सरकार की सहायता वाली योजना इस योजना के अतिरिक्‍त होगी।

जैविक खेती को बढ़ावा

जैविक खेती को, जैविक खेती की राष्‍ट्रीय परियोजना (एनपीओएफ), राष्‍ट्रीय बागवानी मिशन (एनएचएम) और राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के अंतर्गत बढ़ावा दिया जा रहा है।

नियामक तंत्र

गुणवत्‍ता सुनिश्चित करने के लिए देश को निर्यात, आयात और घरेलू बाजार के लिए प्रमाणीकरण प्रक्रिया में अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर प्रशंसा मिली है।

सहायता

अन्‍य चीजों के साथ-साथ एनपीओएफ के अंतर्गत दी जाने वाली महत्‍वपूर्ण सहायता में वनस्‍पति खाद वाले पौधे और जैविक खाद, जैविक खाद का गुणवत्‍ता नियंत्रण, प्रशिक्षण के जरिये मानव संसाधन विकास, जैविकीय मिट्टी का आकलन और जागरूकता पैदा करना शामिल है।

राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना और राष्‍ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत जैविक खेती अपनाने के लिए और प्रमाणीकरण के लिए राज्‍यों को वित्‍तीय सहायता देना है।

हांलाकि खाद्यान्‍न की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पैदावार को अधिकतम करना समीक्षात्‍मक है लेकिन कृषि उत्‍पादकता को बनाए रखना होगा। रासायनिक खादों के अंधाधुध इस्‍तेमाल और बची हुई फसलों को हटाने के कारण मिट्टी खराब हो रही है। इन समस्‍याओं को हल करने के लिए सरकार जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है। पत्तियों की खाद, जैविकीय कीट नियंत्रण और घासफूस के प्रबंधन जैसे खेती के परम्‍परागत तरीकों के साथ आधुनिक प्रौद्योगिकी को शामिल किया गया है।

· कृषि मंत्रालय से प्राप्‍त जानकारी

जनसंख्‍या स्‍थि‍रता : आगे का रास्ता

2011 की जनगणना के आधार पर भारत की आबादी एक अरब, 21 करोड़ है जो दुनि‍या में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। भारत के पास वि‍श्‍व की कुल भूमि‍ का 2.4 प्रति‍शत हि‍स्‍सा है जबकि‍ उसकी आबादी वि‍श्‍व की कुल आबादी का 17.5 प्रति‍शत है।

जनसंख्‍या स्‍थि‍रता सदैव सरकार का प्राथमि‍क एजेंडा रहा है जि‍से पूरा करने के लि‍ए परि‍वार नि‍योजन सरकार के उपायों में से एक है। वर्ष 1952 में भारत वि‍श्‍व का पहला देश था जि‍सने जनसंख्‍या स्‍थि‍रता के लि‍ए एक राष्‍ट्रीय कार्यक्रम शुरु कि‍या था। इस कार्यक्रम के तहत परि‍वार नि‍योजन पर जोर देकर जन्‍म दर को कम करना था ताकि‍ ‘आबादी को एक ऐसे स्‍तर पर स्‍थि‍र कि‍या जा सके जो राष्‍ट्रीय अर्थव्‍यवस्‍था के तकाजों के अनुरूप हो।’ कार्यक्रम बहुत समय से जारी है और इस समय परि‍वार नि‍योजन कार्यक्रम पर दोबारा ध्‍यान दि‍या जा रहा है ताकि‍ जनसंख्‍या स्‍थि‍रता के साथ‑साथ मातृ मृत्‍यु दर और शि‍शु मृत्‍यु दर को कम कि‍या जा सके।

राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या नीति‍, 2000

राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या नीति‍, 2000 के अंतर्गत एक ऐसा नीति‍गत ढांचा बनाना है जो लक्ष्‍य प्राप्‍ति‍ और रणनीति‍ कार्यान्‍वयन में सहायक हो ताकि‍ प्रजनन संबंधी और बाल स्‍वास्‍थ्‍य की आवश्‍यकताएं पूरी की जा सकें तथा प्रजनन स्‍तरों के बदलाव (टीएफआर 2.1) को 2010 तक प्राप्‍त कि‍या जा सके। राष्‍ट्रीय सामाजि‍क‑जनसांख्‍यकीय लक्ष्‍य तय कि‍ए गए हैं ताकि‍ राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या नीति‍, 2000 के उद्देश्‍यों को पूरा कि‍या जा सके। नीति‍ के उद्देश्‍य हैं:‑

· प्रजनन संबंधी व बाल स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं, आपूर्ति‍ और संरचनात्‍मक ढांचे की अपूर्ण आवश्‍यकताओं को पूरा करना। कुल प्रजनन दर (टीएफआर) के बदलाव स्‍तर को प्राप्‍त करने के लि‍ए छोटे परि‍वारों की अवधारणा को प्रोत्‍साहि‍त करना।

· अस्‍सी प्रति‍शत डि‍लि‍वरी अस्‍पतालों में और शत प्रति‍ शत डि‍लि‍वरी प्रशि‍क्षि‍त व्‍यक्‍ति‍ द्वारा करवाने के लक्ष्‍य की प्राप्‍ति‍।

· प्रति‍ 1000 जीवि‍त बच्‍चों की जन्‍म दर पर आधारि‍त शि‍शु मृत्‍यु दर को 30 से कम करना, प्रति‍ 100,000 जीवि‍त बच्‍चों को जन्‍म देने वाली माताओं की संख्‍या पर आधारि‍त मातृ मृत्‍यु दर को 100 से कम पर लाना, सभी जन्‍म, मृत्‍यु और गर्भधारण का शत प्रति‍ शत पंजीकरण करना तथा टीके द्वारा रोकी जा सकने वाली सभी बीमारि‍यों से बचाव के लि‍ए बच्‍चों को टीके लगाना।

· लड़कि‍यों का वि‍वाह देर से हो यानी 18 से पहले न हो और 20 के बाद हो, ऐसा प्रयास करना।

· प्रजनन नि‍यंत्रण और वि‍भि‍न्‍न प्रकार के गर्भनि‍रोधकों की उपलब्‍धता के वि‍षय में सूचना/परामर्श सबकी पहुंच में हो, यह लक्ष्‍य प्राप्‍त करना।

· संबंधि‍त सामाजि‍क क्षेत्र कार्यक्रमों के कार्यान्‍वयन पर जोर देना ताकि‍ परि‍वार कल्‍याण जन कार्यक्रम बन सके।

राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कुल प्रजनन दर अब भी 2.6 है और यह स्‍थि‍ति‍ राज्‍यों में अलग‑अलग है। नौ राज्‍य प्रजनन दर बदलाव स्‍तर (टीएफआर >3) से काफी ऊपर है, 12 राज्‍य/केंद्र शासि‍त प्रदेश प्रजनन दर बदलाव स्‍तर (टीएफआर – 2.1‑3) को प्राप्‍त करने के नजदीक है जबकि‍ 11 राज्‍यों और तीन केंद्र शासि‍त प्रदेशों ने <2.1 का स्‍तर प्राप्‍त कर लि‍या है।

स्‍वास्‍थ्‍य संकेतकों, पोषण स्‍थि‍ति‍ और सामाजि‍क‑आर्थि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍ के मामले में भी राज्‍यों में वि‍भि‍न्‍नताएं मौजूद हैं। जि‍न राज्‍यों में अन्‍य संकेतक कमजोर हैं, वहां परि‍वार नि‍योजन गति‍वि‍धि‍ भी धीमी है। अत: जि‍न राज्‍यों में प्रजनन दर ऊंची है, उन राज्‍यों में जनसंख्‍या वृद्धि‍ को रोकने के लि‍ए सामाजि‍क व आर्थि‍क वि‍कास तथा जीवन स्‍तर में सुधार के आधार पर जनसंख्‍या स्‍थि‍रता के लि‍ए समग्र प्रयास कि‍ए जाने चाहि‍ए।

दोबारा जोर देना

इस समय सरकार जनपद वार ध्‍यान दे रही है। इस वि‍षय में 264 जि‍लों को चुना गया है। इन जनपदों और संबंधि‍त राज्‍यों को सरकार समर्थन भी दे रही है ताकि‍ परि‍वार नि‍योजन और अन्‍य कार्यक्रमों का बेहतर कार्यान्‍वयन हो सके।

सरकार प्रति‍बद्ध है कि‍ 2012 तक वह मातृ मृत्‍यु दर को 100/100,000 जीवि‍त बच्‍चों के जन्‍म दर तक, शि‍शु मृत्‍यु दर को 30/1000 जीवि‍त बच्‍चों के जन्‍म दर तक तथा प्रजनन दर बदलाव स्‍तर को कुल प्रजनन दर – 2.1 तक लाएगी।

जनसंख्‍या स्‍थि‍रता के लि‍ए रणनीति‍क वि‍कल्‍प

कुल प्रजनन दर >3.0 वाले राज्‍य (बि‍हार, मध्‍यप्रदेश, राजस्‍थान, झारखण्‍ड, छत्‍तीसगढ़ और मेघालय) : आने वाले समय में देश की कुल आबादी में इन राज्‍यों का 50 प्रति‍शत हि‍स्‍सा हो जाएगा। इन राज्‍यों में सबसे पहले जो कार्य कि‍या जाना चाहि‍ए, वह यह है कि‍ अपूर्ण आवश्‍यकताओं को तुरंत पूरा कि‍या जाए और इच्‍छि‍त प्रजनन (दो से अधि‍क बच्‍चे पैदा करने की कामना) पर आधारि‍त दर को कम करने के लि‍ए सामाजि‍क‑आर्थि‍क वि‍कास पर ध्‍यान दि‍या जाए। इसी के साथ भावी जनसंख्‍या वृद्धि‍ को रोकने के लि‍ए वि‍वाह कम आयु में न करने को प्रोत्‍साहन दि‍या जाए और बच्‍चों के पैदा होने की अवधि‍ के बीच पर्याप्‍त फासला सुनि‍श्‍चि‍त कि‍या जाए।

जि‍न राज्‍यों (उत्‍तराखण्‍ड, गुजरात, हरि‍याणा, जम्‍मू‑कश्‍मीर, उड़ीसा) में कुल प्रजनन दर 2.1 से <3 के बीच है : इन राज्‍यों में सबसे पहले यह कार्य कि‍या जाना चाहि‍ए कि‍ दम्‍पति‍यों को मदद की जाए कि‍ वे परि‍वार नि‍योजन कार्यक्रम को मजबूत बनाएं ताकि‍ प्रजनन लक्ष्‍य को प्राप्‍त कि‍या जा सके।

कुल प्रजनन दर <2.1 वाले राज्‍य (दि‍ल्‍ली और हि‍माचल प्रदेश) : इन राज्‍यों में सबसे पहले यह कार्य कि‍या जाना चाहि‍ए कि‍ जनसंख्‍या वृद्धि‍ को रोकने के लि‍ए वि‍वाह कम आयु में न करने को प्रोत्‍साहन दि‍या जाए और बच्‍चों के पैदा होने की अवधि‍ के बीच पर्याप्‍त फासला सुनि‍श्‍चि‍त कि‍या जाए।

ध्‍यान देने योग्‍य प्रमुख क्षेत्र – 12वीं पंचवर्षीय योजना : परि‍वार नि‍योजन

· नए गर्भनि‍रोधकों के माध्‍यम से गर्भनि‍रोध की अपूर्ण आवश्‍यकताओं को पूरा करना।

· परि‍वार नि‍योजन सेवा खासतौर से उन स्‍थानों पर जहां इस तरह के मामले सबसे ज्‍यादा आते हैं, वहां नसबंदी/नलबंदी को प्रोत्‍साहि‍त करना।

· परि‍वार नि‍योजन सेवाओं के प्रदाता आधार को सुधारने के लि‍ए नि‍जी/गैर सरकारी संगठनों की सेवाओं को सूचीबद्ध करना।

· आशा स्‍वास्‍थ्‍यकर्मि‍यों के माध्‍यम से गर्भनि‍रोधकों का समुदाय आधारि‍त वि‍तरण।

परि‍वार नि‍योजन के लि‍ए हर स्‍तर पर और खासतौर से उच्‍चतम राजनैति‍क स्‍तर पर जोरदार हि‍मायत करना।

लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने की रणनीति‍

· प्रत्‍येक स्‍तर (राष्‍ट्रीय, राज्‍य और जि‍ला) पर मानव संसाधन (कार्यक्रम प्रबंधन के लि‍ए) संरचना को मजबूत करना।

· जि‍ला अस्‍पतालों और जहां परि‍वार नि‍योजन संबंधी मामले सबसे ज्‍यादा आते हैं, वहां समर्पि‍त परामर्शक की नि‍युक्‍ति‍ करना।

· आशा स्‍वास्‍थ्‍यकर्मि‍यों के माध्‍यम से कम दरों पर गर्भनि‍रोधकों के वि‍पणन को घरों तक पहुंचाना।

· नसबंदी/नलबंदी सेवाओं के लि‍ए सेवा प्रदाताओं और सेवा प्राप्‍तकर्ता के लि‍ए क्षति‍पूर्ति‍ पैकेज में सुधार करना।

· गर्भाशय में गर्भनि‍रोधक (मल्‍टी लोड आईयूडी ‑ 375) लगाने को प्रोत्‍साहन देना। इसे कम समय के लि‍ए शरीर में लगाना ताकि‍ शरीर धीरे‑धीरे इसे स्‍वीकार कर ले।

· गर्भाशय आधारि‍त गर्भनि‍रोधकों के इस्‍तेमाल और उसे धारण करने को प्रोत्‍साहन देने के लि‍ए आशा स्‍वास्‍थ्‍यकर्मि‍यों के वास्‍ते प्रदर्शन आधारि‍त भुगतान योजना।

· सेवाओं के लि‍ए और अधि‍क नि‍जी सेवा प्रदाताओं/गैर सरकारी संगठनों को सूचीबद्ध करना।

· जोरदार समर्थन को सुनि‍श्‍चि‍त करना।

·

*****

*स्‍वास्‍थ्‍य एवं परि‍वार कल्‍याण मंत्रालय से प्राप्‍त जानकारी

पृथ्‍वी प्रणाली वि‍ज्ञान संगठन

पृथ्‍वी के वि‍भि‍न्‍न घटकों के बीच मजबूत संबंधों, उदाहरणार्थ वातावरण, महासागर, साइरो‑स्‍फीयर और जि‍यो‑स्‍फीयर, के महत्‍व को स्‍वीकार करते हुए पृथ्‍वी वि‍ज्ञान मंत्रालय को 2006 में गठि‍त कि‍या गया था। इसके तुरंत बाद वर्ष 2007 में एक वास्‍तवि‍क संगठन अस्‍ति‍त्‍व में आया। यह था पृथ्‍वी प्रणाली वि‍ज्ञान संगठन (एस्‍सो) जो मंत्रालय का प्रशासनि‍क अंग था। इसके अंतर्गत भू वि‍ज्ञानों की तीन प्रमुख शाखाएं हैं – (1) महासागर वि‍ज्ञान एवं प्रौद्योगि‍की, (2) वातावरण वि‍ज्ञान एवं प्रौद्योगि‍की और (3) भू वि‍ज्ञान एवं प्रौद्योगि‍की। इस प्रयास का एकमात्र उद्देश्‍य था पृथ्‍वी की प्रक्रि‍याओं संबंधी वि‍भि‍न्‍न पक्षों पर आमूल वि‍चार करना ताकि‍ पृथ्‍वी प्रणाली की वि‍भि‍न्‍नताओं को समझा जा सके और मौसम, जलवायु तथा जोखि‍मों की भवि‍ष्‍यवाणी में सुधार कि‍या जा सके।

इसका प्रमुख कार्य मौसम, जलवायु और जोखि‍म की भवि‍ष्‍यवाणी का वि‍कास और सुधार था ताकि‍ सामाजि‍क, आर्थि‍क और पर्यावरणीय फायदा मि‍ल सके। इसके अलावा जलवायु परि‍वर्तन, जलवायु कार्यों और एकीकृत हि‍मालयी मौसम वि‍ज्ञान संबंधी पक्षों का अध्‍ययन करना भी इसकी परि‍धि‍ में था। एस्‍सो का एक दायि‍त्‍व यह भी है कि‍ वह समाज के सामाजि‍क‑आर्थि‍क लाभ के लि‍ए सामुद्रि‍क संसाधनों की खोज उसके दोहन का भी कार्य करे। इसके लि‍ए सामुद्रि‍क पर्यावरण के क्षेत्र में होने वाले वि‍कासों को मद्देनजर रखते हुए कार्य करना है।

दृष्‍टि‍कोण

एस्‍सो का समग्र दृष्‍टि‍कोण है पृथ्‍वी प्रणाली वि‍ज्ञान के संदर्भ में ज्ञान और जानकारी के वि‍षय में महारथ हासि‍ल करना ताकि‍ उसका सामाजि‍क‑आर्थि‍क लाभ भारतीय उपमहाद्वीप और भारतीय महासागर क्षेत्र को मि‍ल सके। इसके तीन प्रमुख घटक हैं:‑

· पृथ्‍वी प्रणाली वि‍ज्ञान में अकादमि‍क और प्रयुक्‍त अनुसंधान के लि‍ए वैज्ञानि‍क और प्रौद्योगि‍कीय समर्थन देना। इसके दायरे में वातावरण, हाईड्रोस्फीयर, सायरोस्‍फीयर और जि‍योस्‍फीयर आते हैं जि‍नका संबंध खासतौर से भारतीय उपमहाद्वीप, आसपास के महासागर और ध्रुवीय क्षेत्रों से है।

· मानसूनों और अन्‍य मौसमें/वातावरणीय मानकों, महासगरीय दशाओं के बारे में राष्‍ट्र को बेहतरीन सेवाएं प्रदान करना। इन सेवाओं में चक्रवात, भूकंप, सुनामी और अन्‍य प्राकृति‍क आपदाओं की पूर्व चेतावनी शामि‍ल है।

· महासागरीय संसाधनों (सजीव और सजीव इतर) की खोज, दोहन और उनका तर्कसंगत उपयोग।

·

एस्‍सो कैसे कार्य करता है ?

एस्‍सो प्रमुख रूप से मौसम (सामान्‍य), कृषि‍, वि‍मानन, नौवहन, क्रीड़ा आदि‍ संबंधी मौसम परामर्श के लि‍ए कार्य करता है। इसके अलावा अन्‍य प्रमुख कार्यों में मानसून, आपदा (चक्रवात, भूकंप, सुनामी, समुद्री जलस्‍तर बढ़ने) के बारे में जानकारी देना, सजीव और सजीव इतर (मछली पकड़ने संबंधी परामर्श, पॉलीमैटेलि‍क नोड्यूल्‍स, गैस हाईड्रेट्स, फ्रेशवॉटर आदि‍), तटीय और समुद्री पारि‍स्‍थि‍ति‍की प्रणाली, जलवायु परि‍वर्तन, अंतरर्जलीय प्रौद्योगि‍की सम्‍मि‍लि‍त हैं। एस्‍सो की प्रमुख योजनाओं में उपग्रह आधारि‍त, वि‍मानस्‍थ और लि‍थोस्‍फीयर नि‍गरानी प्रणाली हैं जो उसके उद्देश्‍य को प्राप्‍त करने में महत्‍वपूर्ण भूमि‍का नि‍भाती हैं। इन नीति‍यों/कार्यक्रमों को उसके स्‍वायत्‍तशासी वि‍भागों व अधीनस्‍थ कार्यालयों जैसे केंद्रों के माध्‍यम से पूरा कि‍या जाता है। भारतीय मौसम वि‍ज्ञान वि‍भाग, राष्‍ट्रीय मध्‍यम श्रेणी मौसम पूर्वानुमान एवं भारतीय ऊष्‍णकटि‍बंधीय मौसम वि‍ज्ञान संस्‍थान, राष्‍ट्रीय अंटार्कटि‍का एवं महासागर अनुसंधान केंद्र, राष्‍ट्रीय महासागर प्रौद्योगि‍की संस्‍थान, भारतीय राष्‍ट्रीय महासगर सूचना सेवा केंद्र, समुद्री सजीव संसाधन केंद्र तथा एकीकृत तटीय एवं समुद्री क्षेत्र प्रबंधन एस्‍सो के अधीन हैं। ये सभी संस्‍थान पृथ्‍वी प्रणाली वि‍ज्ञान संगठन (एस्‍सो) के अंतर्गत आते हैं और इनका प्रबंधन एस्‍सो परि‍षद करती है। प्रत्‍येक केंद्र का गठन एक वि‍शेष अधि‍कार के तहत कि‍या गया है। एस्‍सो, एस्‍सो परि‍षद के जरि‍ए कार्य करता है। यह परि‍षद नीति‍यों और योजनाओं को बनाने की सर्वोच्‍च संस्‍था है जो केंद्रों/इकाईयों को कार्यक्रम नि‍र्देश देती है और कार्यक्रमों के कार्यान्‍वयन की समीक्षा करती है।

वि‍लवणीकरण प्रौद्योगि‍की

वि‍लवणीकरण ऐसी प्रक्रि‍या है जि‍सके तहत ऊर्जा के प्रयोग से नमकीन पानी से शुद्ध पानी प्राप्‍त कि‍या जाता है। वाणि‍ज्‍यि‍क योग्‍यता रखने वाली वि‍लवणीकरण प्रक्रि‍या को थर्मल और मेम्‍ब्रेन प्रक्रि‍याओं में वर्गीकृत कि‍या जाता है। कम तापमान वाली थर्मल वि‍लवणीकरण (एलटीटीडी) एक ऐसी प्रक्रि‍या है जि‍समें समुद्री पानी की ऊपरी गर्म सतह को कम दाब पर वाष्‍पीकृत कि‍या जाता है और उसे गहरे समुद्री ठंडे जल के साथ द्रवीकृत कि‍या जाता है ताकि‍ शुद्ध पानी प्राप्‍त कि‍या जा सके।

एस्‍सो ने देश में चार एलटीटीडी की सफल स्‍थापना की है जो कवारत्‍ती, मि‍नीकॉय, अगत्‍ती, लक्षद्वीप और नॉर्दर्न चेन्‍नै थर्मल पॉवर स्‍टेशन (एनसीटीपीएस), चेन्‍नै में स्‍थि‍त हैं। प्रौद्योगि‍की पूरी तरह से घरेलू, जानदार और पर्यावरणानुकूल है। इन चारों संयंत्रों में से मि‍नीकॉय और अगत्‍ती संयंत्रों की स्‍थापना क्रमश: अप्रैल 2011 और जुलाई 2011 में हुई है। प्रत्‍येक एलटीटीडी संयंत्र की क्षमता प्रति‍ दि‍न एक लाख लीटर उत्‍पादन की है। एक स्‍वतंत्र एजेंसी ने इस प्रक्रि‍या में आने वाले खर्च के संबंध में एलटीटीडी प्रौद्योगि‍की का हाल में अध्‍ययन कि‍या था। इस अध्‍ययन के अनुसार नमकीन पानी से एक लीटर मीठा पानी बनाने में 19 पैसे का खर्च आता है। इसके पहले एस्‍सो ने एलटीटीडी 01 एमएलडी के अपतटीय वि‍लवणीकरण संयंत्र का प्रयोग अप्रैल 2009 में चेन्‍नै से 40 कि‍लोमीटर दूर एक नौका पर कि‍या था। अब एक 10 एमएलडी के अपतटीय संयंत्र का प्रयोग करने का प्रस्‍ताव है। इस समय, पूर्व‑व्‍यवहार्यता अध्‍ययनों के बाद 10 एमएलडी संयत्र का परि‍योजना दस्‍तावेज तैयार कि‍या जा रहा है। एलटीटीडी प्रौद्योगि‍की के लि‍ए समुद्री पानी को कि‍सी रासायनि‍क प्रक्रि‍या से गुजारने की जरूरत नहीं पड़ती। कवारत्‍ती स्‍थि‍त वि‍लवणीकरण संयंत्र से शुद्ध पेयजल मई 2005 से उपलब्‍ध है जि‍सके कारण पानी से पैदा होने वाली बीमारि‍यां 10 प्रति‍शत से भी कम हो गई हैं। यह प्रौद्योगि‍की अब मजबूती के साथ काम कर रही है और इसमें बहुत कम बि‍जली खर्च होती है तथा इसे स्‍थानीय लोग ही चलाते हैं।

दक्षि‍ण ध्रुव वैज्ञानि‍क अभि‍यान

भारत ने नवंबर‑दि‍संबर 2010 के दौरान दक्षि‍ण ध्रुव का वैज्ञानि‍क अभि‍यान सफलतापूर्वक पूरा कि‍या था। यह बहुत महत्‍वपूर्ण अभि‍यान था क्‍योंकि‍ यह 1911 में दक्षि‍ण ध्रुव पर मानव के पहुंचने की स्‍मृति‍ में पूरे वि‍श्‍व में मनाए जाने वाले स्‍मृति‍ समारोह का हि‍स्‍सा था। दक्षि‍ण ध्रुव का पहला अभि‍यान 1902 में शुरू हुआ था और 1911 में पूरा हुआ था। अभि‍यान की प्रकृति‍ वैज्ञानि‍क थी और इसमें बर्फ पर चलने वाले ट्रकों, 80‑90 कि‍लोमीटर प्रति‍ घंटे के हि‍साब से बर्फ पर चलने वाले वाहनों और कुत्‍तों द्वारा खींचे जाने वाली स्‍लेज गाड़ि‍यों को इस्‍तेमाल कि‍या गया था।

शि‍रामाकर ओएसि‍स से दक्षि‍ण ध्रुव के बीच आठ सदस्‍यीय दल ने मूल्‍यवान एटमॉसफेरि‍क एयरोसॉल और असंख्‍य आइस कोर जमा कीं। दल 22 नवंबर, 2010 को दक्षि‍ण ध्रुव पहुंचा तथा नमूने जमा करके अनुसंधान व अन्‍य वैज्ञानि‍क कार्य करने के बाद एक दि‍संबर 2010 को ‘मैत्री’ वापस आ गया। वैज्ञानि‍कों ने रास्‍ते में और दक्षि‍ण ध्रुव पर जो वैज्ञानि‍क अध्‍ययन कि‍ए, उनमें मैत्री‑दक्षि‍ण ध्रुव (एमंडसेन‑स्‍कॉट स्‍टेशन) के बीच नि‍यमि‍त दूरि‍यों पर आइस कोर जमा करना ताकि‍ बर्फ के गुण‑धर्म का अध्‍ययन कि‍या जा सके, जीपीआर सेक्‍शनों के रास्‍ते पर चट्टान संबंधी भौगोलि‍क स्‍थि‍ति‍, सतह के नीचे की बर्फ के ढांचे का अध्‍ययन, पठारों के आसपास ग्‍लेशि‍यल‑जि‍योमॉरफॉलोइकल लैंडफॉर्म्‍स का अध्‍ययन तथा 2000 कि‍लोमीटर लंबे रास्‍ते पर मौसम वि‍ज्ञानी और भू‑भौति‍की मानकों का अध्‍ययन शामि‍ल है।

सुनामी पूर्व चेतावनी प्रणाली

सि‍तंबर 2007 में शानदार सुनामी पूर्व चेतावनी प्रणाली शुरू की गई थी जो आज भी चालू है और दस मि‍नट से भी कम समय में आने वाली आपदा की चेतावनी देने में सक्षम है। राष्‍ट्रीय सुनामी पूर्व चेतावनी केंद्र (एनटीईडब्‍लूसी) चौबीसों घंटे चलता रहता है। इससे यह सुनि‍श्‍चि‍त हो जाता है कि‍ तटों को छूने से पहले ही सुनामी के बारे में पहले से ही पता चल सकता है ताकि‍ लोगों को इलाका खाली करने और आवश्‍यक सुरक्षा उपाय करने का समय मि‍ल जाता है। भूकंपमापी यंत्रों, कंपन आंकड़ों और ज्‍वार पैमानों के नेटवर्क को तैयार कि‍या गया है ताकि‍ समयोचि‍त आंकड़े और सुनामी एलर्ट जारी की जा सके। मोटे तौर पर 329 भूकंपमापी स्‍टेशनों (27 राष्‍ट्रीय और 302 अंतर्राष्‍ट्रीय) से प्राप्‍त आंकड़ों का वि‍श्‍लेषण कि‍या जाता है। इसके अलावा एनटीईडब्‍लूसी को हिंद महासागर के 60 अंतर्राष्‍ट्रीय ज्‍वार पैमानों से भी समयोचि‍त आंकड़े प्राप्‍त होते हैं। पूर्व चेतावनी प्रणाली सुनामी जनि‍त जोरदार भूकंपों, महासागर में सुनामी की लहरों के फैलाव और समुद्री जलस्‍तर में बदलाव की नि‍गरानी करता है। इस केंद्र को हिंद महासगर क्षेत्र के संदर्भ में क्षेत्रीय सुनामी सेवा प्रदाता के तौर पर मान्‍यता दी जाती है। हिंद महासागर के रि‍म देश अक्‍टूबर 2011 से केंद्र से सेवाएं प्राप्‍त कर रहे हैं, और औपचारि‍क रूप से यूनेस्‍को के अंतरसरकारी महासागरीय वि‍ज्ञान आयोग सहि‍त ऑस्‍ट्रेलि‍या और इंडोनेशि‍या ने हिंद महासागर पूर्व चेतावनी प्रणाली के तौर पर मान्‍यता दी है।

मॉनसून अभि‍यान

भारतीय मॉनसून के पूर्वानुमान के लि‍ए एस्‍सो ने मॉनसून अभि‍यान शुरू कि‍या है। मॉनसून के बेहतर पूर्वानुमान से राष्‍ट्र को कृषि‍ के लि‍ए पूर्व तैयारी और मॉनसून के प्रभाव के संदर्भ में काम करने में सहायता मि‍लेगी। इस पूर्वानुमान के दो हि‍स्‍से हैं – मौसमी एवं अंत:मौसमी मॉनसून पूर्वानुमान तथा मध्‍यम वि‍स्‍तार पूर्वानुमान। अभि‍यान, राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय अनुसंधान समूहों को समर्थन देने पर ध्‍यान केंद्रि‍त करेगा तय लक्ष्‍यों और उत्‍पादों के साथ ताकि‍ वह मध्‍यम वि‍स्‍तार और वि‍स्‍तृत और मौसमी वि‍स्‍तार पैमानों में सुधार कर सके जो पूर्वानुमानों के बेहतर कौशल और गत्‍यामक पूर्वानुमानों के ढांचे के सृजन के जरि‍ए कि‍ए जाएंगे। अभि‍यान नि‍रीक्षण कार्यक्रमों को भी समर्थन देगा जि‍सका परि‍णाम प्रक्रि‍याओं की बेहतर समझ के रूप में सामने आएगा। अभि‍यान के अधीन, भारतीय उष्‍णकटि‍बंधीय मौसम वि‍ज्ञान संस्‍थान सहयोग करेगा और मौसमी और अंत: मौसमी पैमानों पर आधारि‍त पूर्वानुमानों में सुधार करने का प्रयास करेगा। राष्‍ट्रीय मध्‍यम वि‍स्‍तार मौसम पूर्वानुमान केंद्र (एनसीएमआरडब्‍लूएफ) नेतृत्‍व करेगा और मध्‍यम वि‍स्‍तार पैमाने में पूर्वानुमानों में सुधार करने का प्रयास करेगा। इन सबको भारतीय मौसम वि‍ज्ञान वि‍भाग (आईएमडी) चालू करेगा। वि‍भि‍न्‍न सामयि‍क और आकाशीय वि‍स्‍तारों में पूर्वानुमान कौशल में सुधार करने के प्रयास स्‍वरूप राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय संस्‍थाओं से प्रस्‍ताव आमंत्रि‍त कि‍ए जाएंगे जो प्रत्‍येक वि‍शि‍ष्‍ट परि‍योजनाओं और उत्‍पादों के संदर्भ में होंगे। इन साझीदारों को आईआईटीएम और एनसीएमआरडब्‍लूएफ में उपलब्‍ध एचपीसी सुवि‍धा प्राप्‍त करने की अनुमति‍ होगी जि‍न्‍हें इस उद्देश्‍य के लि‍ए बढ़ाया जाएगा। एक राष्‍ट्रीय समन्‍वय समूह बनाया जा रहा है ताकि‍ कार्यक्र म को चलाया जा सके और अभि‍यान की प्रगति‍ की समीक्षा की जा सके। (पसूका फीचर्स)

बाल संरक्षण अधिकार -उभरती संरचना और तंत्र

बच्चों के अधिकारों, समानता और उनके विकास के लिए प्रतिबद्धता का भारत का लम्बा इतिहास रहा है, जो उसकी आबादी का 40 फीसदी हिस्सा हैं। सरकार का मानना है कि बच्चों को उनके जीवन, व्यक्तित्व और बचपन को किसी भी तरह के वास्तविक या महसूस होने वाले खतरे या जोखिम से सुरक्षा का अधिकार है। कुछ बच्चे हालांकि अपने सामाजिक, आर्थिक और भूराजनीतिक परिस्थितियों की वजह से दूसरों से ज्यादा असहाय होते हैं और इसलिए उन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। इस प्रकार के बच्चों को कई गुणा ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें बाल श्रम और बच्चों से दुर्व्‍यवहार, विस्थापन और असुरक्षित प्रवासन, पेशेवर यौन शोषण के लिए गैर कानूनी खरीद-फरोख्त, घरेलू कार्य, भिक्षावृत्ति, मानवअंगों का कारोबार तथा पोर्नग्राफी, विशेष जरूरतों वाले तथा किसी अपराध में संलिप्तता के संदिग्ध बच्चों की विशेष देखभाल, नागरिक असंतोष की वजह से बना असुरक्षित वातावरण तथा अनाथ, त्यागे हुए और निराश तथा परिवारों की देखभाल से वंचित बच्चों के लिए परिवार आधारित देखभाल पर ध्यान देने का अभाव शामिल है। सरकार की विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों का निरंतर प्रयास रहा है कि उनके हितों का संरक्षण किया जाए।

अपने अस्तित्व के 64 वर्षों में देश, प्रशासन में आए आमूल-चूल बदलावों का साक्षी रहा है-कल्याण आधारितदृष्टिकोण की जगह अधिकारों पर आधारितदृष्टिकोण। इस बदलाव को परिलक्षित करने के लिए बच्चों के लिए नीति और कार्यक्रमों की समीक्षा की गई है और नए उपाय शुरू किए गए हैं। इन परिस्थितियों में रहने वाले बच्चों की जरूरतें पूरी करने के लिए नीतियों/कार्यक्रमों के साथ कानून लाए गए हैं। इसके अलावा बाल अधिकारों के उल्लंघन के मसले को सुलझाने के लिए वर्ष 2007 से राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग काम कर रहा है। हाल ही में मंत्रालय ने बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों से उनकी सुरक्षा के लिए संसद में एक विधेयक पेश किया है हालांकि बच्चों की सुरक्षा की देखभाल के लिए बाल न्याय (बच्चों की देखभाल एवं सुरक्षा) अधिनियम, 2000 प्राथमिक कानून है जो कठिन परिस्थितियों में बच्चों का कल्याण सुनिश्‍चि‍त करने के लिए जरूरी संरचना और प्रक्रियाएं मुहैया कराता है।

मौजूदा तथा बदलते परिवेश की वजह से उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्‍यक नीति और कानूनी ढांचे के मौजूद होने के बावजूद, कार्यक्रम से सम्बद्ध हस्तक्षेप का दायरा सीमित तथा आवंटन अपर्याप्त था। बच्चों की जरूरतों की समझ कम थी और उन्हें पूरा करने को हरगिज प्राथमिकता नहीं दी जाती थी। परिणामस्वरूप, मानवीय एवं अवसंरचनात्मक संसाधन साथ ही साथ बच्चों के लिए उपलब्ध सेवाएं अपर्याप्त थीं और गुणवत्तापूर्ण भी नहीं थीं।

इन बच्चों के बारे में उचित एवं विश्वसनीय आंकड़ों के अभाव के कारण स्थिति ज्यादा गंभीर हो गई थी। बच्चों के हितों की सुरक्षा के लिए कार्य कर रहे विभिन्न हितधारकों और विभागों में सीमित समन्वयन, दुर्व्‍यवहार और शोषण रोकने के प्रयासों पर बहुत कम/बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया। इस प्रकार जहां एक ओर कठिन परिस्थितियों में बच्चों का कल्याण सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा सुविधाएं पहले से अपर्याप्त थीं, वहीं दूसरी ओर, असहाय बच्चों के लिए सुरक्षा का कोई तंत्र मौजूद नहीं था, ऐसे बच्चों की तादाद तेजी से बढ़ रही थी। इसलिए बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण का निर्माण करने के लिए एक ऐसे राष्ट्रव्यापी समग्र कार्यक्रम की जरूरत महसूस की जाने लगी, जो उनकी वृद्धि और विकास के अनुकूल हो। इस जरूरत को पूरा करने के लिए 2009-10 से एकीकृत बाल संरक्षण योजना (आईसीपीएस) शुरू की गई।

एकीकृत बाल संरक्षण योजना

आईसीपीएस के तहत विविध बाल संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए, जिनमें (1) बाल न्याय के लिए कार्यक्रम (2) फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के लिए एकीकृत कार्यक्रम और (3) एक ही जगह विस्तृत नियमों और नए कार्यक्रमों सहित देश के भीतर बच्चों को गोद देने को बढ़ावा देने के लिए गृहों (शि‍शु गृह) को सहायता देने की योजना। अन्य बातों के साथ-साथ यह योजना दुर्व्‍यवहार, उपेक्षा, शोषण, त्याग दिए गए और परिवारों से बिछुड़े बच्चों की असुरक्षा में कमी लाना चाहती है। आईसीपीएस प्रकृति में परिपूर्ण है और इसके अलावा बच्चों की देखभाल के लिए कानूनी और प्रशासनिक ढांचा तैयार करने के साथ-साथ बाल न्याय अधिनियम के क्रियान्वयन में तेजी लाने, गुणवत्तापूर्ण देखभाल मुहैया कराने के लिए गृहों के गठन में सहायता प्रदान करती है, गैर-संस्थागत देखभाल को बढ़ावा देती है और गुमशुदा बच्चों के लिए वेबसाइट सहित बाल निगरानी प्रणाली का गठन करती है।

आईसीपीएस के अधीन सेवाएं

आईसीपीएस के अधीन जो सेवाएं सशक्त/प्रारम्भ की जा रही हैं और उन्हें सहायता दी जा रही है, वे हैं:

संस्थागत देखभाल: संस्थागत देखभाल की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए, आश्रय गृहों के निर्माण, सुधार और रखरखाव के वास्ते वित्तीय सहायता मुहैया कराई जा रही है। बाल न्याय अधिनियम के तहत बाल गृह, पर्यवेक्षण गृह और विशेष गृह बनाए गए हैं और विशेष जरूरतों वाले बच्चों (अक्षम और एचआईवी/एड्स से संक्रमित बच्चों) को विशेष सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इस योजना के तहत विभिन्न प्रकार के 1199 गृहों को पहले से ही सहायता दी जा रही है। 18 वर्ष का होने पर गृह छोड़ देने के बाद बच्चों की देखभाल के लिए भी आईसीपीएस के तहत सेवाएं मुहैया कराई जा रही हैं।

गैर-संस्थागत देखभाल: इस योजना के तहत कई गैर-संस्थागत तंत्र मुहैया कराए गए हैं, जिनमें बच्चे को गोद देने, पालन-पोषण, प्रायोजन तथा शहरी और अर्द्ध-शहरी इलाकों में देखभाल और पुनर्वास के लिए आश्रय स्थल खोलने जैसे समुदाय आधारित सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना शामिल है। ये परिवार की देखभाल से वंचित या कम देखभाल वाले बच्चों की देखभाल और सुरक्षा में अहम भूमिका निभाएंगे। इस योजना के तहत बच्चे को गोद लेने का प्रबंध करने वाली 143 विशि‍ष्‍ट एजेंसियां और 104 मुक्त आश्रयस्थल पहले ही काम कर रहे हैं।

आपातकालीन सहायता सेवाएं : चाल्डलाइन 1098‘ बच्चों के लिए समर्पित टेलीफोन सहायता सेवा है। योजना के तहत यह सेवा नए स्थानों पर उपलब्ध कराई जा रही है और यह पूरे देश में चरणबद्ध ढंग से लागू की जाएगी। पिछले दो वर्षों में चाइल्डलाइन के दायरे में आने वाली जगहों की संख्या दुगनी हो गई है और अब यह सेवा देश भर में 164 शहरों/जिलों में उपलब्ध है।

बाल निगरानी प्रणाली: बाल निगरानी प्रणाली का गठन आईसीपीएस के तहत एक अन्य प्रमुख पहल है। यह बाल संरक्षण से सम्बद्ध आंकड़ों के स्पष्ट अंतर मिटाने के लिए गुमशुदा बच्चों की तलाश संबंधी वैबसाइट सहित सभी बाल संरक्षण सेवाओं तक पहुंच वाली एक वैब आधारित प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस) है।

संवैधानिक एवं सेवा प्रदाता संरचनाएं:

यह योजना न्याय और बाल संरक्षण अधिकार सुनिश्चित करने के लिए बाल न्याय अधिनियम के तहत गठित बाल कल्याण समितियों और बाल न्याय बोर्ड्स जैसी संवैधानिक सेवाओं/संरचनाओं को सशक्त भी बनाती है। इन संवैधानिक संस्थाओं की स्थापना में आईसीपीएस के तहत व्यापक प्रगति की गई है। अब तक देश भर में 548 बाल कल्याण समितियां (योजना शुरू होने से पहले 240) और 561 बाल न्याय बोर्ड्स (आईसीपीएस शुरू होने से पहले 211) की स्थापना की गई है।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि बाल संरक्षण पर उचित ध्यान दिया गया है और सेवाओं की गुणत्ता पर्याप्त रही है, यह योजना विशेष रूप से बाल संरक्षण पर सेवा प्रदाता नेटवर्क शुरू करने पर जोर देती है, जो पूरे देश में लागू की जाएगी। इसमें केंद्र के स्तर पर केंद्रीय परियोजना सहायता इकाई, राज्य और जिला स्तर पर बाल संरक्षण संस्थाएं तथा व्यवहारिक स्तर पर बच्चा गोद देने की सरकारी संसाधन एजेंसियां (स्टेट एडॉप्‍शन रिसोर्स एजेंसियां) शामिल हैं।

आईसीपीएस उन बच्चों की मदद करती है जो मुश्‍कि‍ल हालात में हैं और उन पर ध्यान तथा सहायता दिए जाने की जरूरत है। देश में ऐसे बच्चों के लिए फिलहाल कोई अनुमान उपलब्ध नहीं है। जिला बाल संरक्षण इकाइयों और राज्य बाल संरक्षण संस्थाओं जैसी संरचनाओं के चालू होते ही इस योजना को लागू करने के लिए तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होकर उभरेगी। वे असहाय बच्चों, उनकी असहायता के स्वरूप तथा उनके लिए जरूरी संरक्षण का आकलन करेंगी। बच्चों के लिए वर्तमान में उपलब्ध सेवाओं के बीच संबंध कायम करने तथा राज्य के कार्यक्रमों के दायरे में बच्चों की जरूरतों पर एकतरफा ध्यान देने की दिशा में भी काम करने के लिए इन संरचनाओं की जरूरत है।

अब तक 14 राज्यों में, 21 राज्य बाल संरक्षण संस्थाएं, 11 बच्चा गोद देने की सरकारी संसाधन एजेंसियां (स्टेट एडॉप्‍शन रिसोर्स एजेंसियां) और 14 जिला बाल संरक्षण इकाइयां गठित की गई हैं। पूरी तरह लागू होते ही आईसीपीएस बच्चों के अधिकारों के संरक्षण में जुटे बाल सुरक्षा कर्मियों का करीब 900 सदस्यों का कॉडर तैयार करेगी।

निष्कर्ष

देश में पहली बार बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के लिए इस प्रकार की महत्वपूर्ण पहल की गई है और समय के साथ इसकी परिणति संस्थाओं, एजेंसियों और खासतौर पर इस कार्य को अंजाम देने के लिए प्रशि‍क्षि‍त लोगों के एक समर्पित कॉडर के उदय में होगी। सभी राज्यों और संघशासित प्रदेशों ने आईसीपीएस लागू करने के लिए समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं और उसका कार्यान्वयन शुरू कर दिया है।

यह योजना जटिल है और इस बारे में समझ कायम करने तथा बच्चों की जरूरतें पूरी करने के लिए आवश्‍यक संसाधन जुटाने के वास्ते राज्यों को कुछ समय लगा। हालांकि आईसीपीएस की शुरूआत राज्य के साथ ही साथ स्वयंसेवी क्षेत्रों दोनों में बाल संरक्षण मामलों के प्रति रुचि जागृत करने का माध्यम साबित हुई है। राज्य/ संघशासित प्रदेश अब सामाजिक संगठनों के सहयोग तथा शि‍क्षा, श्रम और स्वास्थ्य जैसे अन्य विभागों को मिलाकर, बाल संरक्षण सेवाओं की जरूरतों पर एक ऐसा दृष्टिकोण तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं, जो अब तक नहीं किया गया है।

वर्ष 2011-12 में इसे अन्य राज्यों साथ ही साथ पहले से इन्हें पहले से कार्यान्वित कर रहे राज्यों में भी लापरवाही बरत रहे इलाकों में लागू किया जाया जाएगा। राज्यों को इन संस्थागत संरचनाओं की स्थापना करने और उन्हें चालू करने में समय लगेगा। आईसीपीएस ने राज्यों में काफी रुचि उत्पन्न की और उससे ज्यादा बाल देखभाल और संरक्षण के मसले पर समझ का वातावरण तैयार करने में मदद की है। हम आशा करते हैं कि बच्चों के लाभ के लिए यह समझ और भी बेहतर होगी।

* महि‍ला एवं बाल वि‍कास मंत्रालय से प्राप्‍त जानकारी