Thursday, August 25, 2011

सामाजिक-आर्थिक और धार्मिक अल्‍पसंख्‍यकों से संबंधित कार्यवाही

सरकार सच्‍चर समिति की सिफारिशों पर अनुवर्ती कार्यवाही के रूप में कई कदम उठाती रही है। यह कार्यवाही सरकार के उस मूल सिद्धांत के अनुरूप है, जिसके अंतर्गत सरकार व्‍यापक विकास द्वारा अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्‍थितयों में सुधार लाना चाहती है ताकि देश के हर नागरिक को एक गतिशील राष्‍ट्र के निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लेने के समान अवसर मिलें। अल्‍पसंख्‍यक कार्य मंत्रालय के अलावा अनेक मंत्रालय/विभाग इस प्रयास में लगे हुए हैं। सच्‍चर समिति की सिफारिशों पर सरकार द्वारा लिए गए फैसलों को लागू करने की स्‍थिति इस प्रकार है :-

वित्‍तीय सेवा विभाग

· सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों से कहा गया है कि वे उन जिलों में ज्‍यादा शाखाएं खोलें जहां अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की आबादी काफी ज्‍यादा है। 2007-08 से मार्च 2011 तक ऐसे क्षेत्रों में विभिन्‍न बैंकों की 2448 शाखाएं खोली गई।

· भारतीय रिजर्व बैंक ने अल्‍पसंख्‍यक समुदायों के लिए ऋण की सुविधाओं में सुधार के लिए प्राथमिकता के आधार पर ऋण देने के अपने 5 जुलाई, 2007 के मास्‍टर सर्कुलर में संशोधन किया है। मार्च 2011 तक अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के लोगों को 1,43,396.70 करोड़ रुपए उपलब्‍ध कराए गए जो प्राथमिक आधार पर दिए गए कुल ऋण का 14.16 प्रतिशत है।

· बड़े-बड़े बैंकों की जिला सलाहकार समितियां अल्‍पसंख्‍यकों के ऋण के लिए आवेदन पत्रों को स्‍वीकृत किए जाने या अस्‍वीकृत किए जाने पर नियमित रूप से निगरानी करती है।

· महिलाओं में छोटे-छोटे ऋण लेने को प्रोत्‍साहित करने के लिए अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की महिलाओं के लिए 5,87,088 बैंक खाते खोले गए हैं और उन्‍हें 2010-11 में 3984.72 करोड़ रुपए के छोटे ऋण उपलब्‍ध कराए गए।

· सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंक,उन प्रखंडों/जिलों/कस्‍बों में जागरूकता कार्यक्रम चला रहे हैं, जहां अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की काफी आबादी है। 2010-11 में ऐसे क्षेत्रों में 1976 जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए।

· बड़े-बड़े बैंकों ने अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की अच्‍छी आबादी वाले प्रखंडों/जिलों/कस्‍बों में 1219 उद्यमशीलता विकास कार्यक्रम आयोजित किए।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय

· कस्‍तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना के तहत अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की ज्‍यादा आबादी वाले जिलों में 426 कस्‍तूरबा गांधी बालिका विद्यालय खोले जा चुके हैं। 2010-11 में ऐसे 64 और विद्यालय खोले जाने को स्‍वीकृति दी गई।

· राज्‍य सरकारों से कहा गया है कि राष्‍ट्रीय माध्‍यमिक शिक्षा अभियान के अंतर्गत नए विद्यालयों को खोले जाने के प्रस्‍तावों पर विचार करते समय अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की ज्‍यादा आबादी वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाए।

· अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की ज्‍यादा आबादी वाले जिलों में 2009-10 में 309 और 2010-11 में 314 नए माध्‍यमिक विद्यालय खोले गए।

· शैक्षिक रूप से पिछड़े देश के 374 जिलों में प्रत्‍येक जिले में एक आदर्श महाविद्यालय खोला जाएगा, जिनमें से 67 महाविद्यालय ऐसे जिलों में खोले जाएंगे जहां अल्‍पसंख्‍यक वर्ग की काफी आबादी है।

· पॉलिटेक्‍निकों पर उपमिशन के तहत, अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की ज्‍यादा आबादी वाले 90 जिलों में ऐ 57 जिले पॉलिटेक्‍निक खोलने के लिए चुने गए हैं, जहां पॉलिटेक्‍निक नहीं हैं या कम संख्‍या में हैं। अभी तक अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की ज्‍यादा आबादी वाले 37 जिलों में पोलिटेक्‍नि‍क खोलने के लिए 140.66 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं।

· उन क्षेत्रों में जहां अल्‍पसंख्‍यक, विशेष रूप से मुस्‍लिम, आबादी ज्‍यादा है, महाविद्यालयों और विश्‍विवद्यालयों में लड़कियों के लिए छात्रावास खोलने को विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा वरियता दी जाती है। यूजीसी ने अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की ज्‍यादा आबादी वाले 90 जिलों में ग्‍यारहवीं योजना के दौरान 239 महिला छात्रावास खोलने की मंजूरी दी है और इसके लिए 64.66 करोड़ रुपए जारी किए हैं।

· क्षेत्रीय गहन एवं मदरसा आधुनिकीकरण कार्यक्रम संशोधित किया गया है और इसे दो योजनाओं में विभक्‍त कर दिया गया है। मदरसों में गुणवत्‍तापूर्ण शिक्षा देने के लिए एक योजना शुरू की गई है। 2010-11 में 12 राज्‍यों के 5045 मदरसों में 11382 शिक्षकों को सहायता देने के लिए 101.47 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया।

· क्षेत्रीय गहन एवं मदरसा आधुनिकीकरण कार्यक्रम से विभक्‍त एक और योजना निजी सहायता प्राप्‍त/ गैर सहायता प्राप्‍त अल्‍पसंख्‍यक संस्‍थानों का बुनियादी ढांचा विकास नाम से एक और योजना शुरू की गई है। 2010-11 में दस राज्‍यों में 124 संस्‍थानों को सहायता प्रदान करने के लिए 22.98 करोड़ रुपए जारी किए गए।

· आगे की शिक्षा जारी रखने और रोजगार के लिए उन राज्‍य मदरसा बोर्डों द्वारा जारी प्रमाण पत्रों को केन्‍द्रीय माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड भारत में स्‍कूली शिक्षा बोर्ड की परिषद (सीओबीएसई) और या किसी अन्‍य स्‍कूली शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा जारी प्रमाण पत्रों के समकक्ष माना जाएगा, जिनके प्रमाण पत्रों और योग्‍यता को संबंधित राज्‍य के बोर्डों द्वारा जारी प्रमाण पत्रों के समकक्ष माना गया है।

· तीन केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों- अलीगगढ़ मुस्‍लिम विश्‍वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्‍लामिया विश्‍वविद्यालय और मौलाना आजाद राष्‍ट्रीय उर्दू विश्‍वविद्यालय में उर्दू माध्‍यम के शिक्षकों के व्‍यावसायिक कौशल के विकास की अकादमियां स्‍थापित की गई हैं।

· प्रधानमंत्री के नए 15 सूत्रीय कार्यक्रम के तहत उर्दूभाषा के शिक्षकों की नियुक्‍ति के लिए वित्‍तीय सहायता देने की संशोधित योजना में किसी ऐसे मोहल्‍ले में जहां 25 प्रतिशत से ज्‍यादा आबादी उर्दू भाषी समुदाय से हो तो उर्दू शिक्षकों की नियुक्‍ति के लिए वित्‍तीय सहायता दी जाती है। 2011 में 25 उर्दू शिक्षकों की नियुक्‍ति के लिए 5.08 लाख रुपए और केरल में 208 उर्दू शिक्षकों को मानदेय देने के लिए 24.96 लाख रुपए मंजूर किए गए।

· सभी राज्‍यों/केन्‍द्र शासित प्रदेशों को स्‍कूली बच्‍चों के अध्‍ययन केन्‍द्र के रूप में वर्तमान स्‍कूल भवनों और समुदाय भवनों को इस्‍तेमाल करने की सलाह दी गई है।

· राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने राष्‍ट्रीय पाठ्यक्रम फ्रेमवर्क 2005 के अनुरूप सभी कक्षाओं के लिए पाठ्य पुस्‍तकें तैयार की हें। पैंतीस विश्‍वविद्यालयों ने अल्‍पसंख्‍यकों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सामाजिक बहिष्‍करण और समावेश नीति के अध्‍ययन के लिए केन्‍द्र शुरू किए हैं। इसके अलावा 2009-10 में 51 विश्‍वविद्यालयों में समान अवसर के केन्‍द्र खोले गए। 2010-11 में 1345 और 2011-12 में 1367 ऐसे केन्‍द्र खोले जाने का प्रस्‍ताव है।

अल्‍पसंख्‍यक कार्य मंत्रालय

· एक कानून द्वारा उपेक्षित समूहों के लिए समान अवसर आयोग के गठन के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है।

· वक्‍फ बोर्ड अधिनियम में संशोधन के लिए एक विधेयक 27 अप्रैल, 2010 को लोकसभा में पेश किया गया और 7 मई, 2010 को पारित कर दिया गया। फिर इसे राज्‍य सभा को भेजा गया। इस विधेयक को राज्‍य सभा की स्‍थायी समिति को भेजा गया। स्‍थायी समिति की इस विधेयक पर विचार के लिए कई बैठकें हो चुकी हैं।

· सरकार ने राष्‍ट्रीय अल्‍पसंख्‍यक विकास एवं वित्‍त निगम (एनएमडीएफसी) के ढांचे में बदलाव के लिए सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी है। ढांचे में बदलाव का ब्‍यौरा तैयार करने के लिए एक सलाहकार समिति नियुक्‍त की गई है।

· अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की घनी आबादी वाले 338 कस्‍बों में तेजी से विकास के लिए उचित रणनीति और कार्यवाही योजना का सुझाव देने के लिए गठित अंतर-मंत्रालय कार्यबल ने 8 नवम्‍बर, 2007 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। संबंधित मंत्रालयों/विभागों को सलाह दी गई है कि वे इन 338 कस्‍बों में अपने कार्यक्रमों को लागू करने को वरियता दें।

· अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के छात्रों के लिए चार छात्रवृत्‍तियां/अध्‍येतावृत्‍तियां शुरू की गई हैं। इन सभी योजनाओं में 30 प्रतिशत छात्रवृत्‍तियां छात्राओं को 2007-08 से 78.68 लाख रुपए की छात्रवृत्‍तियां/अध्‍येतावृत्‍तियां प्रदान की जा चुकी हैं। योजनावार कुल छात्रवृत्‍तियां/अध्‍येतावृत्‍तियों का ब्‍यौरा इस प्रकार है:-

1. कक्षा एक से दस तक मैट्रिकपूर्व छात्रवृत्‍ति योजना । 2008-09 से 66.63 लाख छात्रवृत्‍तियां प्रदान की गई हैं।

2. मैट्रिकोत्‍तर छात्रवृत्‍तियां कक्षा ग्‍यारह से पीएचडी तक । 2007-08 से कुल 10.85 लाख छात्रवृत्‍तियां प्रदान की गई।

3. पाठ्यक्रमों के लिए श्रेष्‍ठता व साधन छात्रवृत्‍तियां। 2007-08 से 120,491 छात्रवृत्‍तियां दी जा चुकी हैं।

4. एमफिल और पीएचडी के लिए मौलाना आजाद राष्‍ट्रीय अध्‍येतावृत्‍ति योजना । 2009-10 के दौरान अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के अध्‍येताओं/छात्रों को 757 अध्‍येतावृत्‍तियां दी जा चुकी हैं।

5. मौलाना आजाद शिक्षा प्रतिष्‍ठान का कुल कोष जो पहले सौ करोड़ रुपए था, अब सात सौ करोड़ रुपए हो गया है। 2011-12 के बजट में 50 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है जिससे यह बढ़कर साढे़ सात सौ करोड़ रुपए हो जाएगा। अपने गठन के बाद से इस प्रतिष्‍ठान ने शिक्षा को प्रोत्‍साहन देने के लिए 1063 गैर सरकारी संगठनों को 139 करोड़ रुपए की वित्‍तीय सहायता प्रदान की है। इस प्रतिष्‍ठान ने 2003-04 से छात्राओं को 59303 श्रेष्‍ठता आधारित छात्रवृत्‍तियां भी दी हैं और इसके लिए 69 करोड़ रुपए जारी किए।

6. अध्‍यापन और सहयोगी कार्य की एक संशोधित योजना 2006-07 में शुरू की गई। 2010-11 में अल्‍पसंख्‍यक वर्ग के 4845 छात्रों ने इससे लाभ उठाया।

7. अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की ज्‍यादा आबादी वाले 90 चुने हुए जिलों में 2008-09 के दौरान एक बहुक्षेत्रीय विकास कार्यक्रम शुरू किया गया। मंत्रालय ने अब तक राज्‍यों /केन्‍द्र शासित प्रदेशों को 2162.03 करोड़ रुपए जारी किए हैं। 2011-12 में 1219 करोड़ रुपए का बजट आबंटन किया गया है।

8. समाचार पत्रों, रेडियो और टीवी के माध्‍यम से लाभार्थियों तक जानकारी पहुंचाने के लिए एक मल्‍टीमीडिया अभियान शुरू किया गया है।

सांख्‍यिकी और कार्यक्रम कार्यान्‍वयन मंत्रालय सामाजिक-धार्मिक समुदायों के लिए विभिन सामाजिक-आर्थिक और बुनियादी सुविधाओं पर जानकारी/आंकड़ों के संकलन के लिए मंत्रालय में एक राष्‍ट्रीय डाटा बैंक खोजा गया है।

योजना आयोग

· योजना आयोग में सही और उचित निर्णय लेने के उद्देश्‍य से संग्रहीत आंकड़ों के विश्‍लेषण के लिए एक स्‍वशासी आंकलन एवं निगरानी प्राधिकरण गठित किया गया है।

· अल्‍पसंख्‍यक समुदायों सहित देश की कौशल-विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए योजना आयोग में कौशल विकास के लिए एक व्‍यापक संस्‍थागत ढांचा स्‍थापित किया गया है। इस ढांचे में कौशल विकास के लिए राष्‍ट्रीय परिषद, राष्‍ट्रीय कौशल विकास समन्‍वय बोर्ड और राष्‍ट्रीय कौशल विकास निगम शामिल हैं।

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग

· सरकारी अधिकारियों को संवेदनशील बनाने के लिए भारतीय लोक प्रशासन संस्‍थान ने एक पाठ्यक्रम तैयार किया है। इस पाठ्यक्रम को लागू करने के लिए इसे केन्‍द्रीय/राज्‍य प्रशिक्षण संस्‍थानों को भेजा गया है और इसे प्रशिक्षण कैलेंडर में शामिल किया गया है। लाल बहादुर शास्‍त्री राष्‍ट्रीय प्रशासन अकादमी ने संगठित सिविल सेवाओं को संवेदनशील बनाने के लिए एक पाठयक्रम तैयार किया है और इसे प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल कर लिया गया है।

· कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने राज्‍य सरकारों और केन्‍द्र शासित प्रदेश के प्रशासकों को सलाह दी है कि वे थानों में मुस्‍लिम पुलिस कर्मियों को और मुसलमानों की ज्‍यादा आबादी वाले इलाकों में मुस्‍लिम स्‍वास्‍थ्‍य कर्मियों और शिक्षकों की तैनाती करें।

· विभाग ने सरकार, रेलवे, राष्‍ट्रीयकृत बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में भर्ती करते समय अल्‍पसंख्‍यकों पर विशेष ध्‍यान देने के उद्देश्‍य से दिशानिर्देश 8 जनवरी, 2007 को जारी किए थे। उसके बाद से अल्‍पसंख्‍यकों की भर्ती पर नियमित रूप से निगरानी रखी जा रही है।

गृह मंत्रालय

· परिसीमन कानून पर समीक्षा के लिए गठित एक उच स्‍तरीय समिति ने सच्‍चर समिति की रिपोर्ट में व्‍यक्‍त की गई चिन्‍ताओं पर विचार किया और अपनी रिपोर्ट प्रस्‍तत कर दी है।

· साम्‍प्रदायिक सद्भाव पर नए दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। राष्‍ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) में एक कार्यकारी दल ने विधेयक का मसौदा तैयार किया है। विधेयक का शीर्षक है साम्‍प्रदायिक और लक्षित हिंसा को रोकना (न्‍याय और पुनरुद्धार) विधेयक, 2011, गृह मंत्रालय ने इस बारे में अपने विचार एनएसी को दे दिए हैं।

शहरी विकास मंत्रालय

· उत्‍तर प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, राजस्‍थान, लक्षद्वीप , पुडुचेरी और केरल की सरकारों ने वक्‍फ बोर्ड की सम्‍पत्‍ति पर किराया नियंत्रण कानून से छूट दी है।

आवास और शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय

· जवाहरलाल नेहरू राष्‍ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) से धन आसानी से जारी किया जा सके, इसके लिए जरूरी है कि लघु और मध्‍यम दर्जे के कस्‍बों के लिए शहरी चुनिंदा ढांचा योजना, कस्‍बों और शहरों के लिए समेकित आवास और झुग्‍गी -झोपड़ी विकास कार्यक्रम के अंतर्गत यह सुनिश्‍चित करने के लिए कदम उठाए गए हैं कि उन कस्‍बों और शहरों के लिए जहां अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की आबादी काफी ज्‍यादा है, विस्‍तृत परियोजना रिपोर्टों में अल्‍पसंख्‍यकों के लिए पर्याप्‍त धन का प्रावधान हो।

श्रम और रोजगार मंत्रालय

· असंगठित क्षेत्र के कामगारों जिनमें घरों में काम करने वाले लोग भी शामिल हैं, को सामाजिक सुरक्षा उपलब्‍ध कराने का एक कानून संसद में पारित किया जा चुका है।

संस्‍कृति मंत्रालय

· जो वक्‍फ बोर्ड भारत के पुरातत्‍व विभाग के अंतर्गत है उनकी सूची की समीक्षा के लिए पुरातत्‍व विभग की राज्‍य वक्‍फ बोर्डों के साथ कई बैठकें हो चुकी हैं।

स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्रालय

· अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की ज्‍यादा आबादी वाले इलाकों में स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण की विभिन्‍न योजनाओं के बारे में जानकारी क्षेत्रीय भाषाओं में दी गई है।

पंचायती राज मंत्रालय

· पंचायती राज मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय द्वारा राज्‍य सरकारों को सलाह दी जा चुकी है कि वे स्‍थानीय निकायों में अल्‍पसंख्‍यकों के प्रतिनिधित्‍व में सुधार करें। (पसूका)

--------------------------------------------------------------------------------------------*अल्‍पसंख्‍यक कार्य मंत्रालय से प्राप्‍त जानकारी पर आधारित।

स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना - नये आयाम

विशेष लेख : श्रम

असंगठि‍त क्षेत्र के गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परि‍वारों (पांच सदस्‍यों के परि‍वार) के लि‍ए राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना को पहली अक्‍तूबर, 2007 को शुरू कि‍या गया था और पहली अप्रैल, 2008 को इस पर अमल होना शुरू हुआ । योजना के अंतर्गत संगठि‍त क्षेत्र में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परि‍वारों को स्‍मार्ट कार्ड के आधार पर प्रति‍परि‍वार का 30,000 रुपये का कैशलेस बीमा प्रति‍वर्ष कि‍या जाता है । बीमे के प्रीमि‍यम का खर्च केन्‍द्र और राज्‍य सरकार 75 और 25 के अनुपात में वहन करती है । पूर्वोत्‍तर राज्‍यों और जम्‍मू-कश्‍मीर में केन्‍द्र और राज्‍य सरकार प्रीमि‍यम का खर्च 90 और 10 के अनुपात में वहन करती हैं । योजना में एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान जाने वाले मजदूरों के लि‍ए स्‍मार्ट कार्ड के मूल्‍य को वि‍भाजि‍त करने का प्रावधान है ।

31 जुलाई, 2011 तक 27 राज्‍यों/केन्‍द्र शासि‍त प्रदेशों ने योजना को लागू करना शुरू कर दि‍या है । इन 27 राज्‍यों/केन्‍द्र शासि‍त प्रदेशों में से 25 राज्‍यों -असम, अरुणाचल प्रदेश, बि‍हार, छत्‍तीसगढ़, दि‍ल्‍ली, गोवा, गुजरात, हरि‍याणा, हि‍माचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, महाराष्‍ट्र, मणि‍पुर, मेघालय, मि‍जोरम, नगालैंड, ओडि‍शा, पंजाब, तमि‍लनाडु, त्रि‍पुरा, उत्‍तर प्रदेश, उत्‍तराखंड, पश्‍चि‍म बंगाल और चंडीगढ़ ने स्‍मार्ट कार्ड जारी करना शुरू कर दि‍ए हैं । 31 जुलाई, 2011 तक दो करोड़ 40 लाख कार्ड जारी कि‍ए जा चुके हैं । आंध्र प्रदेश और राजस्‍थान को छोड़कर शेष राज्‍यों में इस योजना को लागू करने की तैयारी की जा रही है । इन दोनों राज्‍यों की अपनी स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजनाएं हैं ।

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना, भवन नि‍र्माण मजदूर (रोजगार नि‍यमन और सेवा शर्तें) अधि‍नि‍यम, 1996 के तहत भवन-नि‍र्माण में लगे मजदूरों, गली मोहल्‍ले में रेहड़ी पर सामान बेचने वालों और बीड़ी मजदूरों पर भी लागू होगी । इस योजना का लाभ महात्‍मा गांधी नरेगा के उन मजदूरों को जि‍न्‍होंने पि‍छले वि‍त्‍त वर्ष में 15 से ज्‍यादा दि‍नों तक काम कि‍या है और घरेलू काम में लगे नौकरों/नौकरानि‍यों को भी मि‍लेगा ।

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य योजना के वर्ष 2011-12 के लि‍ए बीपीएल परि‍वारों और अन्‍य लक्षि‍त समूहों के लि‍ए परि‍व्‍यय और लक्ष्‍य नि‍म्‍नानुसार हैं -

क्रमांक

योजना का नाम

परि‍व्‍यय

2011-12 के लि‍ए नि‍र्धारि‍त लक्ष्‍य

1

गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परि‍वारों के लि‍ए राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना

312.42 करोड़ रुपये

2.4 करोड़ रुपये

2

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना के लाभों का भवन-नि‍र्माण और अन्‍य नि‍र्माण कार्यों में लगे मजदूरों तक वि‍स्‍तार

भवन नि‍र्माण और अन्‍य नि‍र्माण कार्य अधि‍नि‍यम, 1996 के अंतर्गत गठि‍त बोर्डों द्वारा उपकरों से प्राप्‍त आय

3

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना के लाभों का गली-मोहल्‍लों में रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वालों तक वि‍स्‍तार

19.91 करोड़ रुपये

4.21 लाख

4

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना का बीड़ी मजदूरों तक वि‍स्‍तार

62.25 करोड़ रुपये

10 लाख

5

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना घरेलू कामकाज करने वाले नौकरों/नौकरानि‍यों तक वि‍स्‍तार

350 करोड़ रुपये

4.75 लाख

योजना की मूल वि‍शेषताएं

Ø केन्‍द्रीय सरकार वार्षि‍क प्रीमि‍यम का 75 प्रति‍शत देगी और राज्‍य सरकार 25 प्रति‍शत देगी, प्रशासनि‍क व्‍यय राज्‍य सरकार वहन करेगी । पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में प्रीमि‍यम का 90 प्रति‍शत केन्‍द्रीय सरकार और 10 प्रति‍शत राज्‍य सरकार द्वारा वहन कि‍या जाएगा ।

Ø लाभार्थि‍यों को स्‍मार्ट कार्ड दि‍ए जाएंगे ।

Ø प्रत्‍येक परि‍वार का 30,000 रुपये प्रति‍वर्ष का बीमा कि‍या जाएगा ।

Ø कार्य सम्‍पादन कैश लेस होगा ।

Ø पहले से हुए रोगों के लि‍ए भी खर्च दि‍या जाएगा ।

Ø वि‍भि‍न्‍न रोगों के इलाज और मातृत्‍व के लि‍ए अस्‍पताल में दाखि‍ल होने पर खर्च ।

Ø 30,000 की व्‍यय-सीमा के भीतर हर बार अस्‍पताल जाने पर 100 रुपये का परि‍वहन व्‍यय, जो 1000 रुपये प्रति‍वर्ष तक कि‍या जा सकता है ।

Ø राज्‍य सरकारों द्वारा तैयार की गईं परि‍योजनाओं को केन्‍द्रीय सरकार द्वारा गठि‍त अंतर-मंत्रालय अनुमोदन एवं नि‍गरानी समि‍ति‍के पास स्‍वीकृति‍के लि‍ए भेजा जाएगा ।

योजना की कुछ अनूठी वि‍शेषताएं

Ø स्‍मार्ट कार्ड का इस्‍तेमाल, इससे पूरी योजना कैशलेस हो गई है । इसके अलावा कार्ड को एक स्‍थान ले जाने की सुवि‍धा ।

Ø अत्‍यंत गरीबों के लि‍ए इतने बड़े पैमाने पर सूचना प्रौद्योगि‍की का इस्‍तेमाल ।

Ø बीमा करवाने के लि‍ए सरकारी और नि‍जी कम्‍पनि‍यों का इस्‍तेमाल ।

Ø योजना के लि‍ए व्‍यापारि‍क तरह के मानक तैयार करना ताकि‍योजना लम्‍बे समय तक चलती रहे।

Ø गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परि‍वार से पंजीकरण शुल्‍क के रूप में कुछ अंशदान लेना ताकि‍वह अपने आपको इस योजना से जुड़ा हुआ महसूस कर सके और

Ø कोई आयु-सीमा नहीं रखी गई है । इसलि‍ए वरि‍ष्‍ठ नागरि‍क भी इसका लाभ उठा सकते हैं । (पसूका)

* श्रम और रोजगार मंत्रालय से प्राप्‍त जानकारी पर आधारित

Wednesday, August 24, 2011

nyayik sakriyata k piche ka sach

वर्तमान में भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में न्यायिक सक्रियता का सवाल बहस का मुद्दा है। कहीं न्यायिक सक्रियता को लेकर प्रशंसा हो रही है तो कुछ लोग इसे न्यायपालिका का सीमा उल्लंघन बता रहे हैं। सरकार के कामकाज में दखलंदाजी के चलते न्यायिक सक्रियता को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। पूरी दुनिया में चाहे राष्ट्रपति के चुनाव का मामला हो, सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्षता के सवाल की बात हो या राजनीतिक उथल-पुथल का बात हो, न्यायालय अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। हमारे यहां न्यायिक सक्रियता पर न्यायपालिका को भारी आलोचना सुननी पड़ रही है। इस बीच बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्याय के हित में कोई भी आदेश सुनाने के लिए उसके पास असीमित असाधारण संवैधानिक शक्तियां हैं। भले ही ऐसा करने के लिए वैधानिक प्रावधानों से बाहर निकलना पड़े वह निकल सकता है। यह व्यवस्था सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस एचएल गोखले की पीठ ने एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ आइपीसी की धारा 498-ए के तहत दी। पिछले दिनों काले धन के मामले पर भी खींचतान देखने को मिली। सरकार का मानना है कि काले धन के स्त्रोतों का पता लगाकर उसकी वसूली का काम कार्यपालिका का है न कि न्याय पालिका का। इस मामले में सरकार का मत है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशेष समिति का गठन कार्यपालिका के संवैधानिक दायरे का उल्लंघन या खुलेआम हस्तक्षेप है जिस पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। इस संबंध में सरकार का पक्ष संवैधानिक दृष्टि से सही हो सकता है, लेकिन आखिर वे कौन से कारण रहे जिनके चलते जन सवालों की उपेक्षा किए जाने के फलस्वरूप न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने के लिए विवश होना पड़ा। आखिर यह स्थिति क्यों पैदा हुई इस पर विचार किया जाना चाहिए। सवाल यह है कि न्यायालय की ऐसी कौन सी मजबूरी थी जो विधायिका और कार्यपालिका के कामों में उसे दखल देना पड़ा। जाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति तभी आती है जबकि विधायिका और कार्यपालिका अपने दायित्व का निर्वहन सही ढंग से करने में अक्षम हों या कमजोर हो। सरकार भले ही यह तर्क दे कि न्यायपालिका बहुत से मामलों में ऐसे निर्णय दे चुकी है कि नीति निर्माण और उसके सही तरीके से क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सरकार की है। न्यायालय का दायित्व तो सिर्फ संविधान और उसके अंतर्गत निर्मित कानूनों की व्यवस्था करना है, लेकिन इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि संविधान की रक्षा का सबसे बड़ा दायित्व न्यायपालिका का होता है न कि सरकार का। यही वह अहम कारण है, जिसके चलते अक्सर न्यायपालिका को ऐसे निर्णय लेने पर विवश होना पड़ता है, जो संविधान की दृष्टि से जनहित से जुड़े होते हैं न कि उसमें सरकार का हित निहित हो। उसके लिए संविधान सर्वोपरि है, न कि सरकार। वह बात दीगर है कि भारतीय न्यायिक प्रणाली विश्व में सर्वश्रेष्ठ नहीं है। इस तथ्य को न्यायमूर्ति एसएन ढींगरा भी कह चुके हैं। यह भी सच है कि 75 फीसदी लोगों का न्याय प्रणाली से विश्वास उठ गया है। सर्वेक्षण बताते हैं कि 75 फीसदी लोगों का न्याय प्रणाली से विश्वास डगमगाने लगा है। वह पारदर्शी न्याय प्रणाली के लिए बेचैन हैं। जनता मुकदमों के निपटारे की समय-सीमा का निर्धारण चाहती है। उसकी राय है कि कानून से ऊपर कोई नहीं हो सकता। देश के अन्न भडारों में लाखों टन खाद्यान्न के सड़ने का मामला हो, नोट के बदले वोट का मामला हो, सीवीसी की नियुक्ति को रद करने का मामला हो, काले धन का मामला हो, टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला हो, आदर्श सोसाइटी घोटाला हो या राष्ट्रमंडल खेल घोटाला ये सभी न्यायिक सक्रियता के कारण ही उजागर हुए हैं। न्यायिक सक्रियता का ही परिणाम है कि बड़े-बड़े प्रभावशाली नेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा। न्यायपालिका की इस पहल का देश की जनता ने दिल खोलकर न केवल स्वागत किया, बल्कि सराहना और प्रशंसा भी की है। उसकी नजर में जो काम सरकार को करना चाहिए था, वह न्यायपालिका ने किया। जनता यह भलीभांति जान चुकी है कि यदि न्यायपालिका इन सवालों पर संज्ञान नहीं लेती तो यह घपले-घोटाले कभी उजागर नहीं होते। सरकार तो अपनी कुर्सी बचाने की खातिर लापरवाह बनी रहकर इन पर लीपापोती की भरसक कोशिश करती नजर आयी। कार्यपालिका पर पर्दा डालने की कोशिश का ही नतीजा है कि आज न्यायपालिका को कार्यपालिका के दायित्व को भी निभाना पड़ रहा है। कई जांच न्यायपालिका की निगरानी में चलना इसका सुबूत है। इसके लिए तो सरकार को न्यायपालिका की प्रशंसा करनी चाहिए। सच तो यह है कि यह समय कार्यपालिका और विधायिका के लिए आत्ममंथन का है, राजनीतिक मजबूरियों पर विचार कर उनसे पार निकलने का है ताकि आने वाले समय में संविधान प्रदत्त अपने अधिकारों व कर्तव्यों का सीमाओं में रहकर पालन किया जा सके। ऐसी स्थिति न आने दें कि न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य होना पड़े। यह तभी होता है जबकि विधायिका और कार्यपालिका जन सवालों को महत्व नहीं देती हैं। ऐसी स्थिति में जब न्यायपालिका हस्तक्षेप करती है तो वह सरकारों के कोप का, आलोचना का पात्र बनती है। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी बीते साल स्पष्ट कर चुके हैं कि देश में विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत है। हमारी व्यवस्था शक्तियों के पृथक्कीकरण के सिद्धांत पर काम करती है। इस सिद्धांत में बारीक अंतर है और इस अंतर को समझने की जरूरत है। साथ ही सार्वजनिक घोषणाओं के दौरान सतर्कता बरतने की जरूरत है ताकि हर समय उचित संतुलन बनाए रखना सुनिश्चित किया जा सके। सभी व्यवस्थाएं दबाव और तनाव से गुजरती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक प्रणाली इसका जवाब चर्चा और विचार-विमर्श आयोजित करके देती है। आज के समय में विभिन्न कारणों से यह और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है, जब हम इसमें से कुछ चीजों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। राज्यसभा के उपसभापति के. रहमान खान का भी मानना है कि जहां संसद कानून बनाने का सर्वोच्च निकाय है वहीं न्यायपालिका संविधान और विधायिका द्वारा पारित किए गए कानून की व्याख्या करने की अंतिम शक्ति है। हालांकि विधायिका और न्यायपालिका दोनों ही को अपने कार्य के लिए पूर्ण स्वायत्तता और स्वतंत्रता है फिर भी कुछ ऐसे अवसर आते हैं जबकि दोनों के बीच मतभेद पैदा हो जाते हैं। यह भी सही है कि इससे सत्ताधारी दल के स्वार्थ सिद्ध होते हैं। ऐसे कानूनों को रद करने के मामले अक्सर सुप्रीम कोर्ट और राज्य हाईकोर्ट सामने आए हैं और उन्हें न्यायालय द्वारा समय-समय पर रद भी किया गया है। यह न्यायपालिका के संविधान की रक्षा करने के अधिकार का जीता-जागता सबूत है। जहां तक कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका के हस्तक्षेप का सवाल है, यह सही नहीं है।

रियल एस्टेट-टेलीकॉम में घटा एफडीआइ


नई दिल्ली, एजेंसी : तेजी से आर्थिक विकास की संभावनाओं वाले रियल एस्टेट, निर्माण और दूरसंचार क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) पिछले वित्त वर्ष में सबसे ज्यादा घटा है। जबकि सेवा क्षेत्र, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, ऑटोमोबाइल, ऊर्जा, धात्विक उद्योग, रसायन, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी एफडीआइ में मामूली वृद्धि हुई है। वहीं इलेक्टि्रकल इक्विटपमेंट, बिजली और तेल रिफाइनरी सहित ईधन, दवा, खाद्य प्रसंस्करण और सीमेंट क्षेत्र में पिछले चार साल में कोई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नहीं हुआ है। उद्योग संगठन एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने कहा कि विकासशील देशों के समूह ब्रिक्स देशों में सबसे कम एफडीआइ भारत में हुआ है। देश की आर्थिक वृद्धि की रणनीति मुख्यतौर पर घरेलू उद्यमों और घरेलू मांग पर केंद्रित है जिसमें एफडीआइ और निर्यात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा। वित्त वर्ष 2010-11 में देश में कुल 19.4 अरब डॉलर का एफडीआइ आया जबकि वर्ष 2009-10 में 25.9 अरब डॉलर और वर्ष 2008-09 में 27.3 अरब डॉलर का एफडीआइ देश में आया था। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका (ब्रिक्स) देशों में 2010-11 में सबसे ज्यादा एफडीआइ चीन में 105.7 अरब डॉलर का रहा। इसमें इक्विटी पूंजी, अर्जित आय का पुन:निवेश और अन्य पूंजी शामिल है। ब्राजील में इस दौरान 71.8 अरब डॉलर और रूसी महासंघ में 41.2 अरब डॉलर का एफडीआइ आया। इक्विटी, पुनर्निवेश तथा कंपनियों के बीच आंतरिक कर्ज को मिलाकर भारत में 41.8 अरब डॉलर का एफडीआइ इस दौरान आया। रावत ने कहा कि देश में वित्तीय क्षेत्र पूरी तरह विकसित है। यहां औद्योगिक आधार भी काफी व्यापक है और शिक्षित कर्मियों की बड़ी संख्या मौजूद है। ऐसे में भारत एफडीआइ का लाभ उठाने के लिहाज से बेहतर स्थिति में है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए नीति निर्माताओं को विदेशी निवेश के लिए एक आकर्षक स्थल के तौर पर पेश करने के प्रयास करने चाहिए। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि में 2006-07 में एफडीआइ का हिस्सा 7.5 प्रतिशत और 2007-08 में 8.8 प्रतिशत रहा। वर्ष 2009-10 में यह 13 प्रतिशत तक पहुंच गया लेकिन वर्ष 2010-11 में यह घटकर 12.2 प्रतिशत रह गया। इसके विपरीत दक्षिण अफ्रीका में एफडीआइ जीडीपी के मुकाबले 36.6 प्रतिशत, रूस में 28.7 प्रतिशत और ब्राजील में 22.9 प्रतिशत रहा। हालांकि चीन में एफडीआइ जीडीपी का 9.9 प्रतिशत रहा।

Friday, August 12, 2011

साम्‍प्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए अधिक सक्रिय एनएफसीएच

भारत में विभिन्‍न समुदायों के लोग रहते हैं। विभिन्‍न स्‍तरों पर प्रयास किये जाते हैं कि अलग-अलग समुदायों के बीच सौहार्द बना रहे। गृह मंत्रालय के अधीन साम्‍प्रदायिक सौहार्द के लिए राष्‍ट्रीय प्रतिष्‍ठान (एनएफसीएच) एक ऐसा संगठन है जो साम्‍प्रदायिक सौहार्द कायम करने के लिए काम करता है। सोसाइटी पंजीकरण कानून के अंतर्गत 19 फरवरी, 1992 को एनएफसीएच का पंजीकरण किया गया था। प्रतिष्‍ठान की संचालन परिषद में 24 सदस्‍य हैं और गृह मंत्री इसके अध्‍यक्ष हैं।

एनएफसीएच का आदेश पत्र

एनएफसीएच के आदेश पत्र में अन्‍य बातों के साथ-साथ साम्‍प्रदायिक, जातिगत, नस्‍लीय, आतंकवादी हिंसा से प्रभावित परिवारों के बच्‍चों को सहायता प्रदान करने, साम्‍प्रदायिक सौहार्द और राष्‍ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की गतिविधियों और विभिन्‍न धर्मों और अन्‍य समूहों के बीच एकता और संबंधों को मजबूत करने की गतिविधियों को बढ़ावा देने के कार्यक्रम का बीड़ा उठाना है। गृह मंत्रालय प्रतिष्‍ठान को इस निर्देश के साथ 11 करोड़ रूपये की राशि प्रदान करता है कि एनएफसीएच इस धनराशि का इस्‍तेमाल करेगा और इसकी गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए धनराशि जुटाएगा।

दृष्टि पत्र

केन्‍द्रीय गृह मंत्री की अध्‍यक्षता में 6 जनवरी, 2010 को हुई फाउंडेशन की संचालन परिषद की 15वीं बैठक में, फैसला किया गया कि एक समिति एनएफसीएच के लिए पांच वर्ष का ‘दृष्टि पत्र’ तैयार करे। संचालन परिषद के सदस्‍यों के साथ चर्चा और उनके सुझावों को शामिल करते हुए और प्रतिष्‍ठान के वित्‍तीय और मानव संसाधनों को ध्‍यान में रखते हुए 24 दिसम्‍बर, 2010 को हुई इसकी बैठक में परिषद ने दृष्टि पत्र को मंजूरी दे दी।

एनएफसीएच का सपना ‘भारत को साम्‍प्रदायिक या किसी अन्‍य प्रकार की हिंसा से मुक्‍त करना है, जहां सभी नागरिक खासतौर से बच्‍चे और युवा, सहयोगपूर्ण सामाजिक कार्य, जागरूकता कार्यक्रम‍, हिंसा से प्रभावित बच्‍चों को सहायता के जरिये साम्‍प्रदायिक सौहार्द कायम करके, राष्‍ट्रीय एकता को मजबूत बनाकर और अनेकता में एकता को बढ़ावा देकर शांति और सौहार्द से रह सकें।

सामरिक लक्ष्‍य

एनएफसीएच के प्रमुख लक्ष्‍य हैं:

शिक्षा और जागरूकता- बच्‍चों और युवाओं के लिए शै‍क्षिक कार्यक्रमों की पेशकश और सहायता, लोगों में जागरूकता और शांतिपूर्ण सहअस्तित्‍व, आपसी सम्‍मान और विश्‍वास के लिए ज्ञान पैदा करना।

2; भागीदारी और पहुंच- निचले स्‍तर सहित राज्‍य, राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर साझेदारों और हिस्‍सेदारों की विशेषज्ञता और प्रतिबद्धता का गहरा प्रभाव कायम करना

3 मान्‍यता और पुरस्‍कार –साम्‍प्रदायिक सौहार्द, सामाजिक सम्‍बन्‍ध और राष्‍ट्रीय एकता के लिए व्‍यक्तिगत और संस्‍थागत स्‍तर पर उल्‍लेखनीय योगदान देने वालों की पहचान और पुरस्‍कार देना।

4 हिंसा से प्रभावित बच्‍चों के लिए सकारात्‍मक कार्रवाई- साम्‍प्रदायिक, जातीय और आतंकवादी हिंसा से प्रभावित इलाकों में बच्‍चों का पता लगाकर उनके जीने, सुरक्षा, शिक्षा, व्‍यावसायिक प्रशिक्षण और विकास के अधिकार सुनिश्चित करना।

5 संसाधन जुटाना-धन जुटाने सहित सहयोग के प्रयास करना जिसमें सरकार, जनता और निजी क्षेत्र और नागरिक समाज सहित प्रमुख हिस्‍सेदार शामिल हों।

प्रमुख गतिविधियां

लक्ष्‍यों को हासिल करने के लिए एनएफसीएच निम्‍न गतिविधियां इस प्रकार हैं-

शिक्षा और जागरूकता : जनता तक पहुंचने के लिए सेमिनार, कार्यशाला, चर्चाएं, चित्रकला प्रतियोगिता आदि आयोजित करना शामिल है। स्‍कूल/विश्‍वविद्यालय स्‍तर पर जागरूकता पैदा करने के कार्यक्रम, समान विचार वाले अन्‍य संगठनों के साथ साझेदारी में शांति और सौहार्द के बारे में वार्षिक जन जागरूकता अभियान आयोजित करना, साम्‍प्रदायिक सौहार्द और राष्‍ट्रीय एकता के बारे में फैलोशिप और वित्‍तीय सहायता देना, हिंसा और साम्‍प्रदायिक संघर्ष के दुष्‍परिणामों और उसके बच्‍चों और युवाओं पर पड़ने वाले खराब असर के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए मीडिया से प्रचार करना और त्‍योहारों और सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में लोगों को एकत्र करके शांति और सौहार्द के पर्व को बढ़ावा देना शामिल है।

साझेदारी और पहुंच : प्रतिष्‍ठान साम्‍प्रदायिक सौहार्द के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए समग्र रूप से लोगों को शामिल करने की दिशा में कार्य करता है। यह शिक्षण, सरकारी और धार्मिक संगठनों के साथ साम्‍प्रदायिक सौहार्द अभियान चलाता है, देश के समान विचारधारा वाले संस्‍थानों का पता लगाकर इस क्षेत्र में सक्रिय लोगों और शिक्षकों की एक सूची बनाता है, ‘शांति और सौहार्द के लिए स्‍वयंसेवियों’ को प्रोत्‍साहित करता है जिससे युवाओं को साम्‍प्रदायिक सौहार्द और राष्‍ट्रीय एकता के लिए काम करने का मौका मिलता है, एनएफसीएच के मकसद को बढ़ावा देने के लिए स्‍वयंसेवी संगठनों/गैर सरकारी संगठनों, आरडब्‍लूए के साथ सहयोग और राष्‍ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए किताबों का प्रकाशन और फिल्‍में बनाना शामिल है।

मान्‍यता –एनएफसीएच साम्‍प्रदायिक सौहार्द और राष्‍ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए व्‍यक्तियों और संगठनों को पुरस्‍कार देने के लिए नामांकन आमंत्रित करता है, भारत के उप-राष्‍ट्रपति के नेतृत्‍व वाले निर्णायक मंडल की बैठक बुलाता है और हर साल किसी व्‍यक्ति और संस्‍थान को उसके उल्‍लेखनीय योगदान के लिए पुरस्‍कृत करता है।

सकारात्‍मक कार्रवाई- एनएफसीएच साम्‍प्रदायिक, जातीय और आंतकवादी हिंसा से प्रभावित बच्‍चों को उनकी शिक्षा के लिए वित्‍तीय सहायता प्रदान कर सकारात्‍मक कार्रवाई करता है, समाज में हुई हिंसा से प्रभावित बच्‍चों का पता लगाता है, इन बच्‍चों को नये सिरे से सहायता देता है।

संसाधन जुटाना- हर साल नवम्‍बर में झंडा दिवस के अवसर पर शिक्षण और सरकारी संस्‍थानों से मिलने वाली दान की राशि एकत्र करना और पीएसई और निजी क्षेत्र से धन जुटाना।

रोडमैप

प्रतिष्‍ठान के सपने को साकार करने के लिए अगले पांच वर्ष के लिए एक रोडमैप तैयार किया गया है। इसमें पेशेवरों की प्रमुख भूमिका होगी जबकि नियमित कर्मचारी और कुछ अनुभवी पेशवरों को कुछ विशेष कार्य करने के लिए लगाया जा सकता है।

धन जुटाने के प्रयासों में मदद और प्रतिष्‍ठान में नई जान फूंकने के लिए, प्रस्‍ताव रखा गया है कि एनएफसीएच के प्रमुख मित्र धन जुटाने, वित्‍तीय प्रबंध, मानव संसाधन और सामान्‍य प्रशासन के क्षेत्र में समय-समय पर विशेषज्ञता प्राप्‍त दिशा निर्देश प्रदान करते रहें।

शांति और सौहार्द के लिए स्‍वयंसेवक

एनएफसीएच ने स्‍वयंसेवियों का नेटवर्क तैयार करने के लिए हाल ही में ‘शांति और सौहार्द के लिए स्‍वयंसेवी’ कार्यक्रम शुरू किया है। ‍गांधीवादी अवधारणा से स्‍वयंसेवियों का नेटवर्क स्‍थापित करने की प्रेरणा मिली, जो शांति और सौहार्द का माहौल बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। एनएफसीएच देश में हर साल 19 से 25 नवम्‍बर तक साम्‍प्रदायिक सौहार्द अभियान सप्‍ताह मनाता है।

शांति, अहिंसा और वसुधैव कुटुम्‍बकम की अवधारणा में यकीन रखने वाले भारत के किसी भी नागरिक का स्‍वागत है। पहले चरण में एनएसएस, एनवाईकेएस, एनवाईसी,एनसीसी, सिविल डिफेंस और स्‍कूल/ कॉलेज/विश्‍वविद्यालय के छात्रों और कार्पोरेट को शामिल किया जाएगा और सीएसओ, मोहल्‍ला समितियों, आरडब्‍लूए, सदभावना क्‍लबों, जिला शांति समितियों के साथ काम करने वालों को दूसरे चरण में शामिल किया जाएगा। स्‍वयंसेवी की न्‍यूनतम उम्र 15 वर्ष और न्‍यूनतम शैक्षणिक योग्‍यता 10 वीं होनी चाहिए।

संतुलित रवैया अपनाने के लिए दृष्टि पत्र में साम्‍प्रदायिक सौहार्द और राष्‍ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए ऐहतियाती उपायों पर अधिक जोर दिया गया है। उम्‍मीद है कि वर्तमान गतिविधियों को कारगर और मजबूत बनाने के लिए नई दृष्टि और प्रस्‍तावित नई पहल के साथ, एनएफसीएच आने वाले वर्षों में अधिक स्‍पष्‍ट, जोशपूर्ण और चुस्‍त संगठन बन जाएगा।

(पीआईबी फीचर)