अमेरिका के साथ हुए परमाणु करार के बाद ही देश में परमाणु ऊर्जा को लेकर विरोध का माहौल बना हुआ है । सबसे ज्यादा चिंता विकीरण के खतरों को लेकर व्यक्त की जा रही है । जहां भी न्यूक्लीयर पावर प्लांट लगाने की योजना बनती है, स्थानीय लोग बड़े स्तर पर उसका विरोध शुरू कर देते हैं । जापान के फुकुशिमा में इसी साल हुए परमाणु हादसे के बाद ऐसी चिंताओं को और भी बल मिला है । हादसे से कहीं भी इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन कुछ संगठनों द्वारा जिस प्रकार से इन खतरों को बढ़ाचढ़ाकर कर पेश किया जा रहा है, वह चिंताजनक है । आम लोगों में इस बाबत भ्रम फैलाया जा रहा है कि सामान्य परिस्थितियों में परमाणु संयंत्रों से कोई विकीरण हर जगह प्राकृतिक रूप से भी विद्यमान है । एक सीमा तक खतरनाक नहीं होता है । परमाणु ऊर्जाविभाग और न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन ऑफ इंडिया परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों और इससे जुड़ी अन्य भ्रांतियों को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चला रहा है । इसी कड़ी में उसने एक था बुधिया की कहानी- एक खुशहाल गांव की भी शुरू की है। इसमें यही दिखाया गया है कि किस प्रकार एक गांव में लोग परमाणु बिजलीघर लगाने का विरोध करते हैं लेकिन जब उन्हें इस ऊर्जा के फायदे , सुरक्षा उपायों और फैलाई जा रही भ्रांतियों के बारे में बताया जाता है तो गावं के सभी लोग इसे महत्व को समझने लगते हैं । परमाणु और इससे बनने वाली बिजली और विकीरण को लेकर क्या भ्रांतियां हैं, उसका ब्यौरा हम यहां दे रहे हैं ।
परमाणु क्या है ?
सभी पदार्थ तत्वों से बने होते हैं । हाइड़्रोजन , कार्बन, आक्सीजन स्वर्ण आदि सभी तत्व हैं । परमाणु किसी तत्व का संभवत सबसे छोटा कण है । इसका व्यास एक मीटर के 1000 करोड़वें (यानी करीब 10 अरब) हिस्से के बराबर होता हे । प्रत्येक तत्व के अपने विशिष्ट गुणधर्मी परमाणु होते हैं । जैसे दीवार, ईंट या पत्थरों की बनी होती है । उसी प्रकार प्रत्येक पदार्थ अरबों परमाणुओं से बना होता है । सभी जीवित और निर्जीव वस्तुएं पदार्थ से बनी होते हैं । परमाणु का एक अंदरूनी हिस्सा नाभिक या न्यूक्लियस कहलाता है । जो प्रोटोन और न्यूट्रोन कणों से मिलकर बना होता है । यह नाभिक इलेक्ट्रोन कणों से घिरा रहते हैं जो नाभिक के चारों और एक विशिष्ट पथ आर्बिट में चक्कर लगाते रहते हैं ।
प्रोटोन धन आवेशित होते हैं जबकि इलेक्ट्रान ऋणात्मक आवेशित वाले होते हैं । जबकि न्यूट्रान किसी भी आवेश से आवेशित नहीं होते हैं । किसी भी तत्व में प्रोटोन और इलेक्ट्रोन की संख्या बराबर होते हैं । नतीजा यह होता है कि कोई भी परमाणु आवेश रहित होता है । अभी तक ऐसे 108 तत्वों का पता लग चुका है जिन्हें पिरियाडिक टेबल में उनके एटामिक नंबर के अनुसार रखा गया है । किसी भी तत्व के नाभिक में प्रोटोनों की संख्या ही उसका एटामिक नंबर होता है । पिरियाडिक टेबल में पहले तत्व हाइड्रोजन है जिसका एटॉमिक नंबर -1 है । इसी प्रकार किसी भी तत्व के प्रोटोन और न्यूट्रॉन को जोड़कर उसका परमाणु भार निकाला जा सकता है ।
रेडियोएक्टिविटी
1896 में एक फ्रांसीसी भैतिकीविद् को संयोग से यूरेनियम यौगिक की रेडियोएक्टविटी का पता लगा था । उन्होंने अचानक ही इसका प्रभाव एक बिना एक्सपोज की हुई फोटोग्राफिक फिल्म पर देखा । बाद में वर्ष 1897 में मैरी क्यूरी और उनके प्रति पियरे क्यूरी ने दो और रेडियोएक्टिव तत्वों पोलोनियम और रेडियम की पहचान करने में सफलता पाई । इन रेडियोएक्टिव तत्वों से निकलने वाले उत्सर्जनों की पहचान अल्फा, बीटा तथा गामा किरणों के रूप में हुई ।
विकरण (रेडिएशन)
किसी भी स्रोत से ऊर्जा का उत्सर्जन विकीरण कहलाता है । रेडियोएक्टिव परमाणु जो विकरण उत्सर्जित करते हैं उसे नाभिकीय विकीरण कहा जाता है । यह मुख्यत तीन प्रकार का होता है । अल्फा , बीटा एवं गामा किरणों के रूप में । कुछ भारी परमाणु न्यूट्रोन कण भी विकीरण उत्सर्जित करते हैं जिन्हें न्यूट्रोन विकीरण कहा जाता है । उच्च ऊर्जा विकीरण अन्य परमाणुऔं और अणुओं के इलेक्ट्रोनों को उनसे अलग करने में सक्षम होते हैं जिनके माध्यम से वे गुजरते हैं। इस तरह के विकरण को आयनीकरण विकीरण कहते हैं ।
मानव स्वास्थ्य पर असर
यदि विकीरण मानव शरीर से गुजरता है तो इसके प्रभाव से कुछ अणु क्षतिग्रस्त हो सकते हैं । लेकिन विकरण की मात्रा अधिक नहीं हो और यह एक लंबी अवधि से फैला हो तो क्षतिग्रस्त अणु अपने आप ही अपनी मरम्मत कर पूर्व स्थिति में आ जाते हें । मानव शरीर में जो प्राकृतिक रूप से परम्मत रूप से मरम्मत करने की प्रक्रिया है वह निरंतर चलती रही है । कई बार ऐसा भी होता है कि ये क्षतिग्रस्त अणु गलत तरीके से आपस में जुड़ जाते हैं । ऐसे में इनका प्रभाव कोशिकाओं की गतिविधियों पर पड़ सकता है । यदि विकिरण ज्यादा हो और कम अवधि में हुआ हो तो शरीर का प्राकृतिक मरम्मत करने वाला तंत्र ही बिगड़ जाता है और वह सही कार्य नहीं कर पाता है। ऐसी स्थिति में विकिरण का प्रभाव तुरंत देखा जाता है ।
विकीरण के प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि एक्सपोजर का क्या स्तर क्या है और एक अवधि के दौरान एक्सपोजर कितनी देर तक हुआ । प्रभाव को निम्न, मध्यम और उच्च तीन श्रेणियों में बांट सकते हैं । हममें से प्रत्येक व्यक्ति प्राकृतिक विकिरण से प्रभावित हो रहा है । इस प्रकार के प्रभाव को हम निम्नस्तर का एक्सपोजर कह सकते हैं । प्राकृतिक स्तर के 100 गुना एक्सपोजर को मध्यम स्तर का और उससे अधिक एक्सपोजर को उच्च्स्तर का कहा जाता है । निम्न एकसपोजर से कोई नुकसान नहीं है । लेकिन मध्यम एवं लंबी समयावधि के बाद दुष्प्रभाव छोड़ते हैं । कैंसर का होना इसमें सबसे महत्वपूर्ण है । अनुसंधानों से स्पष्ट हो गया है कि कैंसर कई कारणों से होसकता है लेकिन निम्न एवं मध्यम विकीरण एक्सपोजर से कैंसर नहीं होता है । इससे उल्टी या मितलाने जैसी घटना हो सकती है । लेकिन लंबे समय तक होने वाले विकीरण से कैंसर हो सकता है । लेकिन तभी जब यह प्रकृति में फैले विकीण से हजार गुना ज्यादा हो ।
परमाणु ऊर्जा को लेकर भ्रांतियां
परमाणु ऊर्जा को लेकर चार किस्म की भ्रांतियां हैं । पहली भ्रांति यह है कि परमाणु ऊर्जा के रिएक्टरों से बड़े पैमाने पर विकीरण होता है जो मानव स्वाथ्य के लिए घातक है । इसमें कोई दो राय नहीं कि विकीरण के बड़े डोज स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकते हैं । क्योंकि इनके कारण दो तरह के जैविक प्रभाव पड़ सकते हैं । एक शारीरिक प्रभाव यानी जहां उद्भासन के कारण व्यक्ति प्रभावित होता है और दूसरा आनुवांशिक प्रभाव जहां प्रभावित व्यक्ति की अगली पीढ़ी में रेडिएशन का प्रभाव पड़ता हे । लेकिन ऐसी आशंका तभी है जबकि विकीरण की मात्रा ज्यादा हो जबकि परमाणु संयंत्रों में विकीरण को नियंत्रित किया जाता है जो विकिरण की मात्रा को मॉनीटर करते रहते हैं । इसलिए खतरा नहीं है । जबकि रासायनिक एवं पेट्रोकेमिकल उद्योगों, कोयले को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने वाले बिजलीघरों से निकलने वाले विषैले रसायनों , लकड़ी और कंडे के जलने से भी इस प्रकार के जैविक प्रभाव पड़ सकते हैं । कुछ और तथ्य भी हैं । जैसे विकिरण हमारे पर्यावरण का हिस्सा है। अन्य उद्योगों के हानिकारण प्रभावों की तुलना में विकीरण के प्रभाव पहले से ही ज्ञानहै तथा उनके रोकथाम के पर्याप्त इंतजाम हैं ।
दूसरी भ्रांति नाभिकीय अपशिष्ट और इसके प्रबंधन के संबंध है। नाभिकीय अपशिष्ट एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान नहीं हो सकता है। जबकि वास्तविकता यह है कि विश्व की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में समक्ष ऊर्जा के सभी प्रकारों में परमाणु ऊर्जा ही एक ऐसा विकल्प है जो सबसे कम अपशिष्ट उत्सर्जित करती है। दूसरे, इसका आसानी से प्रबंधन किया जा सकता है। इसके तरीके उपलब्ध है। तीसरे परमाणु ऊर्जा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री परिष्कृत होकर सदियों तक चलती रहती है। इसलिए अपशिष्ट बहुत ही कम निकलता है। जबकि जीवाश्म ईधनों से उत्सर्जित अपशिष्ट का समाधान नहीं है। जीवाश्म ईंधन के अपशिष्ट को वायुमंडल में यूं ही छोड़ दिया जाता है। इनके निपटान के लिए प्रौद्योगिकी नहीं है। जबकि परमाणु ऊर्जा के अपशिष्ट के निपटान के लिए उक्वकोटि की प्रौद्योगिकी भी उपलब्ध है।
तीसरी भ्रांति यह है कि नाभिकीय रिएक्टरों से हथियारों का उत्पादन होता है। यह पूरा सच नहीं है। परमाणु बम बनाने वाले पहले पाँच देश नाभिकीय ऊर्जा से विद्युत उत्पादन करने से पहले ही परमाणु बम बना चुके थे। यानी परमाणु बम बनाने के लिए रिएक्टर बनाने की जरूरत नहीं है। इसलिए यह सोच ही गलत है। दूसरे, भारत जैसे देशों की नीति हमेशा ही परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल विकास और शांतिपूर्ण कार्यों के लिए करने की रही है।
चौथी भ्रांति परमाणु विद्युत संयंत्र एक बम की तरह है तथा किसी दुर्घटना की स्थिति में यह अपने आप एक बम बन जाएगा। थ्री माइल्स, चेर्नोबिल, फुकुशिमा में हम इसकी भयावहता देख चुके हैं। थ्री माइल्स आईलैंड के बारे में सच्चाई यह है कि इसका आम जनता के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पडा था। रिएक्टर को क्षति पहुंची लेकिन विकरीण का प्रभाव इतना कम था कि इससे प्राकृतिक वायुमंडल प्रभावित नहीं हुआ। चेर्नोबिल एक त्रासदी थी जिसका आम जनता और पर्यावरण पर प्रभाव पडा है। ऐसी ही दुर्घटना फुकुशिमा में इसी साल हुई। इन रिएक्टरों में संरक्षा प्रौद्योगिकी, कार्य पद्धति तथा संरक्षात्मक अवरोधों की व्यवस्था सामान्य नहीं पाई गई। बावजूद इसके इन हादसों से बम जैसी स्थिति पैदा नहीं हुई। दूसरे, वैज्ञानिकों ने दोनों हादसों से सबक लिए हैं और संरक्षा के उपाय मजबूत बनाए हैं। फुकुशिमा हादसे के बाद प्रधानमंत्री के निर्देश पर एनपीसीआईएल ने विशेषज्ञ समिति गठित कर देश में चल रहे सभी 20 परमाणु रिएक्टरों की जांच की और उनमें सुरक्षा उपायों की समीक्षा की। बता दें कि इन रिएक्टरों से इस समय 4780 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। इस समय रावतभाटा, काकरापार और कैगा में छह रिएक्टर निर्माणाधीन है। जबकि 14 और रिएक्टर अगले पाँच-दस सालों के भीतर लगने हैं। 2030 तक परमाणु बिजली का उत्पादन 35 हजार मेगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। दरअसल, देश में चालीस फीसदी आबादी को आज भी समुचित बिजली उपलब्ध नहीं है, इसलिए ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के लिए परमाणु ऊर्जा के विकल्प को छोड़ा नहीं (पीआईबी फीचर)
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