Thursday, August 11, 2011

बाल संरक्षण अधिकार -उभरती संरचना और तंत्र

बच्चों के अधिकारों, समानता और उनके विकास के लिए प्रतिबद्धता का भारत का लम्बा इतिहास रहा है, जो उसकी आबादी का 40 फीसदी हिस्सा हैं। सरकार का मानना है कि बच्चों को उनके जीवन, व्यक्तित्व और बचपन को किसी भी तरह के वास्तविक या महसूस होने वाले खतरे या जोखिम से सुरक्षा का अधिकार है। कुछ बच्चे हालांकि अपने सामाजिक, आर्थिक और भूराजनीतिक परिस्थितियों की वजह से दूसरों से ज्यादा असहाय होते हैं और इसलिए उन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। इस प्रकार के बच्चों को कई गुणा ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें बाल श्रम और बच्चों से दुर्व्‍यवहार, विस्थापन और असुरक्षित प्रवासन, पेशेवर यौन शोषण के लिए गैर कानूनी खरीद-फरोख्त, घरेलू कार्य, भिक्षावृत्ति, मानवअंगों का कारोबार तथा पोर्नग्राफी, विशेष जरूरतों वाले तथा किसी अपराध में संलिप्तता के संदिग्ध बच्चों की विशेष देखभाल, नागरिक असंतोष की वजह से बना असुरक्षित वातावरण तथा अनाथ, त्यागे हुए और निराश तथा परिवारों की देखभाल से वंचित बच्चों के लिए परिवार आधारित देखभाल पर ध्यान देने का अभाव शामिल है। सरकार की विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों का निरंतर प्रयास रहा है कि उनके हितों का संरक्षण किया जाए।

अपने अस्तित्व के 64 वर्षों में देश, प्रशासन में आए आमूल-चूल बदलावों का साक्षी रहा है-कल्याण आधारितदृष्टिकोण की जगह अधिकारों पर आधारितदृष्टिकोण। इस बदलाव को परिलक्षित करने के लिए बच्चों के लिए नीति और कार्यक्रमों की समीक्षा की गई है और नए उपाय शुरू किए गए हैं। इन परिस्थितियों में रहने वाले बच्चों की जरूरतें पूरी करने के लिए नीतियों/कार्यक्रमों के साथ कानून लाए गए हैं। इसके अलावा बाल अधिकारों के उल्लंघन के मसले को सुलझाने के लिए वर्ष 2007 से राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग काम कर रहा है। हाल ही में मंत्रालय ने बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों से उनकी सुरक्षा के लिए संसद में एक विधेयक पेश किया है हालांकि बच्चों की सुरक्षा की देखभाल के लिए बाल न्याय (बच्चों की देखभाल एवं सुरक्षा) अधिनियम, 2000 प्राथमिक कानून है जो कठिन परिस्थितियों में बच्चों का कल्याण सुनिश्‍चि‍त करने के लिए जरूरी संरचना और प्रक्रियाएं मुहैया कराता है।

मौजूदा तथा बदलते परिवेश की वजह से उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्‍यक नीति और कानूनी ढांचे के मौजूद होने के बावजूद, कार्यक्रम से सम्बद्ध हस्तक्षेप का दायरा सीमित तथा आवंटन अपर्याप्त था। बच्चों की जरूरतों की समझ कम थी और उन्हें पूरा करने को हरगिज प्राथमिकता नहीं दी जाती थी। परिणामस्वरूप, मानवीय एवं अवसंरचनात्मक संसाधन साथ ही साथ बच्चों के लिए उपलब्ध सेवाएं अपर्याप्त थीं और गुणवत्तापूर्ण भी नहीं थीं।

इन बच्चों के बारे में उचित एवं विश्वसनीय आंकड़ों के अभाव के कारण स्थिति ज्यादा गंभीर हो गई थी। बच्चों के हितों की सुरक्षा के लिए कार्य कर रहे विभिन्न हितधारकों और विभागों में सीमित समन्वयन, दुर्व्‍यवहार और शोषण रोकने के प्रयासों पर बहुत कम/बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया। इस प्रकार जहां एक ओर कठिन परिस्थितियों में बच्चों का कल्याण सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा सुविधाएं पहले से अपर्याप्त थीं, वहीं दूसरी ओर, असहाय बच्चों के लिए सुरक्षा का कोई तंत्र मौजूद नहीं था, ऐसे बच्चों की तादाद तेजी से बढ़ रही थी। इसलिए बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण का निर्माण करने के लिए एक ऐसे राष्ट्रव्यापी समग्र कार्यक्रम की जरूरत महसूस की जाने लगी, जो उनकी वृद्धि और विकास के अनुकूल हो। इस जरूरत को पूरा करने के लिए 2009-10 से एकीकृत बाल संरक्षण योजना (आईसीपीएस) शुरू की गई।

एकीकृत बाल संरक्षण योजना

आईसीपीएस के तहत विविध बाल संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए, जिनमें (1) बाल न्याय के लिए कार्यक्रम (2) फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के लिए एकीकृत कार्यक्रम और (3) एक ही जगह विस्तृत नियमों और नए कार्यक्रमों सहित देश के भीतर बच्चों को गोद देने को बढ़ावा देने के लिए गृहों (शि‍शु गृह) को सहायता देने की योजना। अन्य बातों के साथ-साथ यह योजना दुर्व्‍यवहार, उपेक्षा, शोषण, त्याग दिए गए और परिवारों से बिछुड़े बच्चों की असुरक्षा में कमी लाना चाहती है। आईसीपीएस प्रकृति में परिपूर्ण है और इसके अलावा बच्चों की देखभाल के लिए कानूनी और प्रशासनिक ढांचा तैयार करने के साथ-साथ बाल न्याय अधिनियम के क्रियान्वयन में तेजी लाने, गुणवत्तापूर्ण देखभाल मुहैया कराने के लिए गृहों के गठन में सहायता प्रदान करती है, गैर-संस्थागत देखभाल को बढ़ावा देती है और गुमशुदा बच्चों के लिए वेबसाइट सहित बाल निगरानी प्रणाली का गठन करती है।

आईसीपीएस के अधीन सेवाएं

आईसीपीएस के अधीन जो सेवाएं सशक्त/प्रारम्भ की जा रही हैं और उन्हें सहायता दी जा रही है, वे हैं:

संस्थागत देखभाल: संस्थागत देखभाल की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए, आश्रय गृहों के निर्माण, सुधार और रखरखाव के वास्ते वित्तीय सहायता मुहैया कराई जा रही है। बाल न्याय अधिनियम के तहत बाल गृह, पर्यवेक्षण गृह और विशेष गृह बनाए गए हैं और विशेष जरूरतों वाले बच्चों (अक्षम और एचआईवी/एड्स से संक्रमित बच्चों) को विशेष सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इस योजना के तहत विभिन्न प्रकार के 1199 गृहों को पहले से ही सहायता दी जा रही है। 18 वर्ष का होने पर गृह छोड़ देने के बाद बच्चों की देखभाल के लिए भी आईसीपीएस के तहत सेवाएं मुहैया कराई जा रही हैं।

गैर-संस्थागत देखभाल: इस योजना के तहत कई गैर-संस्थागत तंत्र मुहैया कराए गए हैं, जिनमें बच्चे को गोद देने, पालन-पोषण, प्रायोजन तथा शहरी और अर्द्ध-शहरी इलाकों में देखभाल और पुनर्वास के लिए आश्रय स्थल खोलने जैसे समुदाय आधारित सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना शामिल है। ये परिवार की देखभाल से वंचित या कम देखभाल वाले बच्चों की देखभाल और सुरक्षा में अहम भूमिका निभाएंगे। इस योजना के तहत बच्चे को गोद लेने का प्रबंध करने वाली 143 विशि‍ष्‍ट एजेंसियां और 104 मुक्त आश्रयस्थल पहले ही काम कर रहे हैं।

आपातकालीन सहायता सेवाएं : चाल्डलाइन 1098‘ बच्चों के लिए समर्पित टेलीफोन सहायता सेवा है। योजना के तहत यह सेवा नए स्थानों पर उपलब्ध कराई जा रही है और यह पूरे देश में चरणबद्ध ढंग से लागू की जाएगी। पिछले दो वर्षों में चाइल्डलाइन के दायरे में आने वाली जगहों की संख्या दुगनी हो गई है और अब यह सेवा देश भर में 164 शहरों/जिलों में उपलब्ध है।

बाल निगरानी प्रणाली: बाल निगरानी प्रणाली का गठन आईसीपीएस के तहत एक अन्य प्रमुख पहल है। यह बाल संरक्षण से सम्बद्ध आंकड़ों के स्पष्ट अंतर मिटाने के लिए गुमशुदा बच्चों की तलाश संबंधी वैबसाइट सहित सभी बाल संरक्षण सेवाओं तक पहुंच वाली एक वैब आधारित प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस) है।

संवैधानिक एवं सेवा प्रदाता संरचनाएं:

यह योजना न्याय और बाल संरक्षण अधिकार सुनिश्चित करने के लिए बाल न्याय अधिनियम के तहत गठित बाल कल्याण समितियों और बाल न्याय बोर्ड्स जैसी संवैधानिक सेवाओं/संरचनाओं को सशक्त भी बनाती है। इन संवैधानिक संस्थाओं की स्थापना में आईसीपीएस के तहत व्यापक प्रगति की गई है। अब तक देश भर में 548 बाल कल्याण समितियां (योजना शुरू होने से पहले 240) और 561 बाल न्याय बोर्ड्स (आईसीपीएस शुरू होने से पहले 211) की स्थापना की गई है।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि बाल संरक्षण पर उचित ध्यान दिया गया है और सेवाओं की गुणत्ता पर्याप्त रही है, यह योजना विशेष रूप से बाल संरक्षण पर सेवा प्रदाता नेटवर्क शुरू करने पर जोर देती है, जो पूरे देश में लागू की जाएगी। इसमें केंद्र के स्तर पर केंद्रीय परियोजना सहायता इकाई, राज्य और जिला स्तर पर बाल संरक्षण संस्थाएं तथा व्यवहारिक स्तर पर बच्चा गोद देने की सरकारी संसाधन एजेंसियां (स्टेट एडॉप्‍शन रिसोर्स एजेंसियां) शामिल हैं।

आईसीपीएस उन बच्चों की मदद करती है जो मुश्‍कि‍ल हालात में हैं और उन पर ध्यान तथा सहायता दिए जाने की जरूरत है। देश में ऐसे बच्चों के लिए फिलहाल कोई अनुमान उपलब्ध नहीं है। जिला बाल संरक्षण इकाइयों और राज्य बाल संरक्षण संस्थाओं जैसी संरचनाओं के चालू होते ही इस योजना को लागू करने के लिए तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होकर उभरेगी। वे असहाय बच्चों, उनकी असहायता के स्वरूप तथा उनके लिए जरूरी संरक्षण का आकलन करेंगी। बच्चों के लिए वर्तमान में उपलब्ध सेवाओं के बीच संबंध कायम करने तथा राज्य के कार्यक्रमों के दायरे में बच्चों की जरूरतों पर एकतरफा ध्यान देने की दिशा में भी काम करने के लिए इन संरचनाओं की जरूरत है।

अब तक 14 राज्यों में, 21 राज्य बाल संरक्षण संस्थाएं, 11 बच्चा गोद देने की सरकारी संसाधन एजेंसियां (स्टेट एडॉप्‍शन रिसोर्स एजेंसियां) और 14 जिला बाल संरक्षण इकाइयां गठित की गई हैं। पूरी तरह लागू होते ही आईसीपीएस बच्चों के अधिकारों के संरक्षण में जुटे बाल सुरक्षा कर्मियों का करीब 900 सदस्यों का कॉडर तैयार करेगी।

निष्कर्ष

देश में पहली बार बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के लिए इस प्रकार की महत्वपूर्ण पहल की गई है और समय के साथ इसकी परिणति संस्थाओं, एजेंसियों और खासतौर पर इस कार्य को अंजाम देने के लिए प्रशि‍क्षि‍त लोगों के एक समर्पित कॉडर के उदय में होगी। सभी राज्यों और संघशासित प्रदेशों ने आईसीपीएस लागू करने के लिए समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं और उसका कार्यान्वयन शुरू कर दिया है।

यह योजना जटिल है और इस बारे में समझ कायम करने तथा बच्चों की जरूरतें पूरी करने के लिए आवश्‍यक संसाधन जुटाने के वास्ते राज्यों को कुछ समय लगा। हालांकि आईसीपीएस की शुरूआत राज्य के साथ ही साथ स्वयंसेवी क्षेत्रों दोनों में बाल संरक्षण मामलों के प्रति रुचि जागृत करने का माध्यम साबित हुई है। राज्य/ संघशासित प्रदेश अब सामाजिक संगठनों के सहयोग तथा शि‍क्षा, श्रम और स्वास्थ्य जैसे अन्य विभागों को मिलाकर, बाल संरक्षण सेवाओं की जरूरतों पर एक ऐसा दृष्टिकोण तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं, जो अब तक नहीं किया गया है।

वर्ष 2011-12 में इसे अन्य राज्यों साथ ही साथ पहले से इन्हें पहले से कार्यान्वित कर रहे राज्यों में भी लापरवाही बरत रहे इलाकों में लागू किया जाया जाएगा। राज्यों को इन संस्थागत संरचनाओं की स्थापना करने और उन्हें चालू करने में समय लगेगा। आईसीपीएस ने राज्यों में काफी रुचि उत्पन्न की और उससे ज्यादा बाल देखभाल और संरक्षण के मसले पर समझ का वातावरण तैयार करने में मदद की है। हम आशा करते हैं कि बच्चों के लाभ के लिए यह समझ और भी बेहतर होगी।

* महि‍ला एवं बाल वि‍कास मंत्रालय से प्राप्‍त जानकारी

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