Thursday, August 11, 2011

indian antarix programme

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम-हाल के सफल अभियान

स्‍वतंत्रता दि‍वस

वि‍शेष लेख-अंतरि‍क्ष

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम देश की विविध सामाजिक-आर्थिक विकासात्मक जरूरतें पूरी करने की क्षमता से युक्त एक स्वदेशी प्रयास है। प्रमुख रूप से भारत के लिए प्रासंगिक अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी और अनुप्रयोगों को विकसित करने तथा उन्हें काम में लाने पर बल दिया जाता रहा है। संचार, प्रसारण और मौसम विज्ञान में सेवाएं प्रदान करने के लिए इनसेट प्रणाली की स्थापना की गई है। भारतीय दूर संवेदी (आईआरएस) उपग्रह प्रणाली की स्थापना प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के लिए की गई है। इसरो ने निम्न पृथ्वी कक्षा (एलईओ), धुव्रीय सूर्य-समकालिक कक्षा और साथ ही साथ भू-समकालिक उपग्रह कक्षाओं में क्रमशः पीएसएलवी और जीएसएलवी प्रक्षेपकों के माध्यम से उपग्रहों का प्रक्षेपण करने की स्वदेशी क्षमता विकसित की है। पीएसएलवी का इस्तेमाल चंद्रमा पर मानवरहित अभियान भेजने में भी किया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन-इसरो ने देश के लिए बेहद लाभकारी रहे अपने सफल अनुप्रयोगों से संचालित कार्यक्रमों के माध्यम से अंतरिक्ष तक पहुंच रखने वाले देशों की सूची में अपना स्थान बनाया है।

सफल अभियान

भारत के ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी-सी17) ने 15 जुलाई 2011 को अपनी 19वीं उड़ान के माध्यम से जीसेट-12 संचार उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया। यह पीएसएलवी की लगातार 18वीं सफल उड़ान थी जिसने एक बार फिर से इसकी उपयोगिता और विश्वसनीयता साबित की। उड़ान के समय 1410 किलोग्राम भार के साथ जीसेट-12 संचार उपग्रह में 12 एक्सटेंडिड सी-बैंड ट्रांसपोंडर्स थे और उसे सफलतापूर्वक भू-समकालिक कक्षा में स्थापित कर दिया गया। जीसेट-12 दूर-चिकित्सा, दूर-शिक्षा और आपदा प्रबंधन सहायता के क्षेत्रों में अंतरिक्ष आधारित अनुप्रयोगों को बढ़ावा देगा।

भारत के अत्याधुनिक संचार उपग्रह, जीसेट-8 को, उड़ान के समय करीब 3100 किलोग्राम वजन के साथ, 21 मई 2011 को कोरू से एरियन-वी यान के साथ सफलतापूर्वक भू समकालिक स्थानांतरण(ट्रांसफर) कक्षा (जीटीओ) में प्रक्षेपित किया गया। फ्रेंच इनसेट प्रणाली और केयू-बैंड में 24 हाई पॉवर ट्रांसपोंडर्स तथा एल 1 और एल 5 बैंड्स में संचालित दो चैनल वाले जीपीएस एडिड जियो अगमेंटिड नेविगे (जीएजीएएन) उपकरण से युक्त है। ट्रांसपोंडर्स इनसेट प्रणाली की क्षमता संवर्द्धित करेंगे जबकि जीएजीएएन उपकरण उपग्रह आधारित संवर्द्धन प्रणाली (एसबीएएस) उपलब्ध कराएगा, जिसके माध्यम से जीपीएस उपग्रह से मिली सूचना के सटीक नियोजन को धरती आधारित रीसिवर्स के नेटवर्क से बेहतर बनाया जाता है और भूसमकालिक उपग्रहों के माध्यम से देश में उपयोगकर्ताओं को उपलब्ध कराया जाता है।

भारत के ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी-सी16) ने अपनी लगातार 17वीं सफल उड़ान में तीन उपग्रहों यानि-रिसोर्ससेट-2, यूथसेट और एक्स-सेट को 20 अप्रैल 2011 को ध्रुवीय सूर्य-समकालिक कक्षा में स्थापित किया। इसरो द्वारा निर्मित रिसोर्ससेट-2-प्राथमिक उपग्रह एक अत्याधुनिक दूर संवेदी उपग्रह है, जो कृषि निगरानी, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, आपदा प्रबंधन सहायता के साथ ही साथ अवसंरचना नियोजन में कई अनुप्रयोगों और सेवाओं को सुगम बनाता है तथा वर्तमान में रिसोर्ससेट-1 द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे दूर-संवेदी डाटा की निरंतरता सुनिश्चित करता है। रिसोर्ससेट-1 का प्रक्षेपण 2003 में किया गया था। यूथसेट तारकीय तथा वातावरण सम्बंधी अध्ययन के लिए एक संयुक्त भारतीय-रूसी उपग्रह है। एक्स-सेट चित्र अनुप्रयोगों के लिए एक सूक्ष्म-उपग्रह है जिसका निर्माण नेनयेंग टैक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (एनटीयू) सिंगापुर ने किया है।

एचवाईएलएएस (अत्यधिक अनुकूलनीय उपग्रह) इस उपग्रह का निर्माण ब्रिटेन के अवंती कम्युनिकेशं के लिए इसरो/एंट्रिक्स और ईएडीएस/यूरोप के एस्ट्रियम ने संयुक्त रूप से किया है। इसे 27 नवंबर 2010 को यूरोपीयन एरियन-5 वी198 यान से प्रक्षेपित और भूसमकालिक कक्षा में स्थापित किया गया।

इसरो ने सुपर कंप्यूटर का निर्माण किया

इसरो ने सुपर कंप्यूटर का निर्माण किया है, जो 220 टेराफ्लॉप्स (220 ट्रिलॉन फ्लोटिंग प्वाइंट ऑपरेशन पर सेकेंड) के सैद्धांतिक अधिकतम प्रदर्षन से सम्बद्ध भारत का तीव्रतम सुपरकंप्यूटर होगा। इस सुपरकंप्यूटिंग सुविधा का नाम सतीष धवन सुपरकंप्यूटिंग फेसिलिटी रखा गया है और यह विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी), तिरूवनंतपुरम में स्थित है। नई ग्राफिक प्रोसेसिंग यूनिट (जीपीयू) आधारित सुपरकंप्यूटर का नाम ‘‘एसएजीए-220’’ (सुपरकंप्यूटर फॉर एयरोस्पेस विद् जीपीयू आर्किटेक्चर-220 टेराफ्लॉप्स ) रखा गया है। इसका इस्तेमाल अंतरिक्ष वैज्ञानिकों द्वारा अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की जटिल समस्याओं को सुलझाने में किया जा रहा है।

आगामी अभियान

पीएसएलसी-सी18 के माध्यम से सितम्बर के आखिर में मेघा-ट्रॉपिक्स उपग्रह के प्रक्षेपण की तैयारियां की जा रही हैं। मेघा-ट्रॉपिक्स (या एमटी-संस्कृत में मेघा का अर्थ है ‘‘बादल’’, ट्रॉपिक्स-‘‘टॉपिक्स’’ के लिए इस्तेमाल होने वाला फ्रांसीसी षब्द है) भारत और फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसियों इसरो और सीएनईएस का एक सहकारी प्रायोगिक अभियान है जिसका उद्देश्य आईटीसीएच (अंतर-ऊष्णकटीबंधीय समाभिरूपता क्षेत्र-इंटर-ट्रॉपिकल कंवर्जंस जोन) विशेष तौर पर 10 डिग्री और 20 डिग्री अक्षांश के बीच, को प्रभावित करने वाली संवहनी प्रणालियों (जल चक्र और ऊर्जा विनिमय) का संतोशजनक सामयिक नमूनों के साथ अध्ययन करना है। मेघा-ट्रॉपिक्स, वैज्ञानिक उपकरणों और भूमध्यवर्ती कक्षा से विशेष निकटता के अपने अनूठे मिश्रण के साथ ऊष्णकटीबंधीय जलवायु प्रणाली के अध्ययन और जलवायु अनुसंधान के लिए (सूर्य-समकालिक कक्षाओं में अन्य मौसम उपग्रहों के डाटा के समरूप) बहुमूल्य डाटा उपलब्ध करा सकता है।

आरआईसेट-1, इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) का उपग्रह चित्र अभियान है जो सी-बैंड एसएआर (सिंथेटिक अपर्चर राडार) इमेजर नामक एक सक्रिय राडार संवेदी प्रणाली का इस्तेमाल कर रहा है। इस साल के आखिर तक इसके प्रकाश सम्बंधी आईआरएस श्रृंखला पर्यवेक्षण अभियान में एक महत्वपूर्ण माइक्रोवेव समपूरक प्रक्षेपित किए जाने की योजना है। कुल मिलाकर आरआईसेट अभियान का उद्देष्य कृषि, वानिकी, मृदा की नमी, भूगर्भ शास्त्र, समुद्री हिम, तटीय निगरानी, पदार्थ की पहचान और बाढ़ नियंत्रण जैसे अनुप्रयोगों में हर तरह के मौसम के अलावा दिन-और-रात में एसएआर पर्यवेक्षण क्षमता का इस्तेमाल करना है। भारतीय क्षेत्रीय नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) एक स्वायत्त क्षेत्रीय जीपीएस आधारित उपग्रह नौपरिवहन प्रणाली है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा विकसित किया जा रहा है, यह अभी निर्माणाधीन है। आईआरएनएसएस में भूसमकालिक कक्षा में स्थापित सात जीपीएस नौपरिवहन उपग्रहों का समूह होगा, जो भारत भर में तथा भारत के आसपास के करीब 2000 किलोमीटर के क्षेत्र में 10 मीटर से ज्यादा की संपूर्ण स्थिति सटीकता (एब्सोल्यूट पोजीशन एक्यूरेसी) उपलब्ध कराएगा। इससे सामरिक उपग्रह नौवहन कार्यक्रम के सुदृढ़ कार्यान्वयन का मार्ग प्रशस्त होगा। स्वदेशी तकनीक से विकसित क्रायोजनिक इंजन के प्रभाव और अवस्था को समझने के लिए समीक्षा समितियों की सिफारिषों को शामिल करते हुए प्रयास शुरू किए गए हैं। इंजन की ग्राउंड टेस्टिंग जारी है। स्वदेशी तकनीक से तैयार क्रायोजनिक इंजन के साथ जीएसएलवी की पहली उड़ान अगले साल की दूसरी तिमाही में सम्पन्न कराने का लक्ष्य रखा गया है। चार टन उपग्रह को जीटीओ में स्थापित करने की क्षमता वाला जीएसएलवी-मार्क 3 ज्यादा सशक्त प्रक्षेपण यान है। यह फिलहाल निर्माणाधीन है। 200 टन ठोस प्रोपेलेंट स्ट्रैप-ऑन बूस्टर्स का पहले ही सफलतापूर्वक स्थैतिक परीक्षण (स्टेटिक टेस्टिंग) किया जा चुका है। 110 टन तरल कोर अवस्था का उड़ान की पूरी अवधि के लिए सफल स्थैतिक परीक्षण किया जा चुका है। जीएसएलवी-एमके 3 परियोजना की की जरूरते पूरी करने के लिए आवश्यक परीक्षण और एकीकृत सुविधाएं स्थापित की गई हैं।

आने वाले महीनों में, इसरो अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के विकास में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल करने वाला है, जो भविष्य के अभियानों को समझने के लिए आवश्यक हैं, जिनके द्वारा देश के लाभ के लिए अंतरिक्ष के अनुप्रयोग को बढ़ावा दिए जाने की संभावना है

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