यह सर्वविदित है कि भारत की आर्थिक विकास दर में तेजी आयी है और अब हमारी औसत वृद्धि दर 8 प्रतिशत से अधिक होने जा रही है। एक आकर्षक कहानी उद्घटित हाने जा रही है और समूचा विश्व भारत के प्रमुख आर्थिक ताकत के रूप में उभरने को चकित आंखो से देख रहा है। लेकिन इस विकास की सीमायें भी हैं। समाज के अनेक सीमांत वर्गों और व्यापक कृषक समुदाय को इस विकास प्रक्रिया का लाभ नहीं पहुँचा है। ऐसे में हमें एक तीव्र और अधिक समाविष्ट करने वाली विकास प्रक्रिया की आवश्यकता है ये दोनों हमारे लिए चुनौती है, किन्तु दोनों को निरंतर प्रयासों के जरिये हासिल किया जा सकता है।
यह ठीक है कि विकास दर 8 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है लेकिन निश्चय ही हम इससे बेहतर कर सकते हैं। गरीबी भारत की एक प्रमुख समस्या है, यदि इसे असरदार तरीके से दूर करना है और साथ ही युवा आबादी को लाभकारी रोजगार प्रदान करना है तो विकास दर 9-10 प्रतिशत तक अवश्य बढ़ानी होगी। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना का व्यापक लक्ष्य इसी उद्देश्य को हासिल करना होना चाहिए। उपरोक्त विकास दर कृषि तथा बुनियादी क्षेत्र के विकास की दिशा में जोरदार प्रयास करके हासिल की जा सकती है, इस लेख में यही उद्देश्य समाहित है।
बुनियादी ढ़ांचा विकास के लिए विशाल संसाधनों की आवश्यकता है। योजना आयोग का अनुमान है कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान बुनियादी ढांचा क्षेत्र-जिसमें मोटे तौर पर सड़क, रेल, विमान एवं जल परिवहन, विद्युत ऊर्जा, दूरसंचार, जलापूर्ति और सिंचाई शामिल हैं-पर 14,50,000 करोड़ रुपये या 320 अरब अमरीकी डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी। यह समूचा निवेश केवल और केवल सार्वजनिक संसाधनों से संभव नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि अब सरकार को सामाजिक क्षेत्र में निवेश बढ़ाना है। यानि शिक्षा, चिकित्सा , स्वास्थ्य, आवास आदि। अब केवल सरकार ही जनसामान्य के लिए सड़क, रेल, विमान और जहाज की व्यवस्था नहीं करेगी। अब सार्वजनिक-निजी भागीदारी, ढांचागत सुधार में मददगार हो सकती है। दूर संचार क्षेत्र को मुक्त बनाना इसका खास उदाहरण है। दूर संचार क्षेत्र में निजी-निवेश की अनुमति दिये जाने से व्यापक निवेश हुआ और आपूर्ति के विस्तार के साथ-साथ गुणवत्ता में सुधार आया। इसी प्रकार उड्डयन के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की बदौलत नई क्षमता पैदा हुई है और यात्रियों को अधिक विकल्प उपलब्ध हुए हैं। विमान यातायात में 20 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई है जबकि किरायों में पर्याप्त कमी आई है। यहाँ तक कि सड़क क्षेत्र में भी सार्वजनिक निजी-भागीदारी की प्रभावकारिता प्रदर्शित हुई है। यह प्रयोग जयपुर-किशनगढ़, राजमार्ग पर सफलतापूर्वक किया गया।
परन्तु यह भी ध्यान देने की बात है कि सार्वजनिक- निजी भागीदारी के जरिये या किसी अन्य मार्ग से निजी क्षेत्र से पूंजी आकर्षित करना न तो आसान है और न ही स्वतः संभव है। इसके लिए पूर्वापेक्षित है कि नीतिगत फ्रेमवर्क तैयार करना है, जो निवेशकों के लिए उचित लाभ सुनिश्चित कर सके। ऐसे में उपभोक्ताओं के हितों विशेषकर निर्धनों के हितों की रक्षा करने की भी दक्षनीति होनी चाहिए। तभी ही सार्वजनिक-निजी भागीदारी सफल हो सकती है।
हम जानतें हैं कि भारत एक संघीय राष्ट्र है और संघीय शब्द में विश्वस्तरीय ढ़ांचे का निर्माण राज्य सरकारों के सहयोग एवं समर्थन पर पर्याप्त हद तक निर्भर है। केन्द्र सरकार चाहें कितनी भी अच्छी नीति या कार्यक्रम क्यों न बनाये, उसे लागू तो राज्यों के कोने-कोने में ही करना है तभी ही व्यावहारिक कहलायेगी, और यह तभी ही होगा जबकि राज्य अपना सहयोगपूर्ण रवैया रखें। इसमें कई पहलू हैं जैसे- कानून व्यवस्था, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुर्नस्थापना, सेवाओं का स्थानांतरण और वन एवं पर्यावरण संबंधी मंजूरियां। राज्यों को चाहिए कि वे पारदर्शिता एवं प्रभावकारी ढ़ंग से सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजनाओं को लागू करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु केन्द्रीय मंत्रालयों द्वारा अपनायी जा रही पद्धतियों की जानकारी प्राप्त करें। राज्य गुणवत्ता युक्त बुनियादी ढ़ाँचा बनाने के प्रयासों में तेजी लायें ताकि उनके राज्यों में निवेश और विकास की गति तेज हो सके। इससे राज्यों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। वे देश के विकास की मुख्य धारा में बराबरी से शामिल हो सकेगें। वित्त मंत्रालय और योजना आयोग भी किसी भेदभाव के बिना राज्यों की इस बाबत सक्रिय रूप से सहायता करें।
हालांकि सरकार ने बुनियादी ढ़ांचे के सभी क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं। सड़क क्षेत्र में स्वर्णिम चतुर्भुज को चार लेन वाला बनाने का काम न केवल पूरा होने के करीब है, बल्कि ’’बनाओ-चलाओ-सौंपो’’ आधार पर समूचे स्वर्णिम चतुर्भुज मार्गों को 6 लेन का बनाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी गई है। इस अकेली परियोजना पर 40,000 करोड़ रुपये की लागत आयेगी। इस राशि का 15 प्रतिशत हिस्सा बजटीय सहायता से प्राप्त होगा। 1000 किमी. लम्बे एक्सप्रेस मार्ग के निर्माण का कार्यक्रम भी शुरू किया गया है। ’’रेलवे’’ 3,00,000 करोड रुपये से अधिक के निवेश का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम तैयार कर रहा है। जिसमें से करीब 40 प्रतिशत सार्वजनिक निजी भागीदारी के माध्यम से निजी क्षेत्र से हासिल किये जाने की संभावना है। प्राईवेट कंटेनर रेलगाडि़याँ, माल ढु़लाई, स्टेशनों का विकास और आधुनिकीकरण, लॉजिस्टिक पार्कों और गोदामों की स्थापनायें सभी ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें महत्वपूर्ण निजी भागीदारी की आवश्यकता है।
नागर विमानन क्षेत्रों में हवाई अड्डा बुनियादी सुविधाओं के लिए वित्त व्यवस्था की योजना विकसित की गई है। इसमें 2012 तक इस क्षेत्र में 40,000 करोड़ रुपये के निवेश का प्रावधान है। निजी विकास के जरिए हरित क्षेत्र हवाई अड्डों को भी पहचान की गई है, जिनका विकास निजी कंपनियों की भागीदारी से हो सकेगा।
इसी तरह प्रमुख बन्दरगाहों पर निजी आपरेटरों द्वारा गोदियों के परिचालन के सफल अनुभव से प्रेरित होकर सरकार 2012 तक 75 नई गोदियों के विकास की योजना बना रही है। जिसमें 53 का विकास निजी-सार्वजनिक भागीदारी के जरिए किया जायेगा।
उपरोक्त विवरण का सार एक तथ्य की ओर आकर रूक जाता है, वह है विद्युत की निरंतर की व्यवस्था। इस बुनियादी सेवा की व्यवस्था किये बिना भारत आर्थिक शक्ति का केन्द्र बनने की कल्पना भी नही कर सकता, देश के अधिकांश राज्यों में बिजली की कमी की समस्या बनी हुई है। राज्यों के विद्युत बोर्ड भारी घाटे में चल रहे रहें हैं। कोई भी सभ्य समाज और वाणिज्यिक दृष्टि से काम करने वाली कंपनी इतनी बडी क्षति को बर्दाश्त नहीं कर सकती। ऐसा अनुमान है कि कुल बिजली उत्पादन का करीब 40 प्रतिशत भाग पारेषण और वितरण के दौरान नष्ट हो जाता है। ऐसे में राज्यों का यह दायित्व बनता है कि यदि विकास का लाभ लेना चाहते हैं तो बिजली की इस अव्यवस्था को उन्हें सुप्रबंधित करना होगा। क्योंकि केन्द्र केवल संसाधनों को उपलब्ध करवा सकता है, प्रबंधन तो राज्यों को ही देखना होगा। बिजली क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा के लिए अवश्य खेलना होगा, क्योंकि ऐसा करने से न केवल उपभोक्ताओं के सामने विकल्प उपलब्ध होंगे बल्कि सक्षमता बढ़ेगी और लागत में भी कमी आयेगी। इसके अलावा बडे़ उपभोक्ताओं को सीधे बिजली बेचने का अवसर मिलने से बिजली उत्पादकों को ऐसे बाजार का निर्माण करने में मदद मिलेगी, जिससे जेनरेशन क्षमता में निवेश में तेजी आयेगी।
उपरोक्त विवरण के आधार पर यह संदेह नहीं है कि आर्थिक विकास को यथार्थता का आवरण तभी पहनाया जा सकता जबकि बुनियादी ढ़ांचागत सुविधाओं का विकास सुदृढ़ योजनागत रूप से हो। इस विकास का उत्तरदायित्व केवल केन्द्र सरकार का ही नहीं बल्कि राज्यों पर भी उसी मात्रा में उत्तरदायित्व जाता है। उन्हें अपनी मानसिकता को बदलना होगा और केन्द्र द्वारा बनायी विकास योजनाओं में सक्रिय रूप से सहभागिता करनी होगी। तभी देश का हरेक कोना आर्थिक रूप से मजबूत होगा और देश स्वाभाविक रूप से आर्थिक महाशक्ति बनेगा।(पसूका)
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